डायबिटीज जांच: केवल HbA1c टेस्ट पर न करें भरोसा, विशेषज्ञों ने चेताया
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में डायबिटीज के निदान के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला HbA1c टेस्ट मरीजों और डॉक्टरों को गुमराह कर सकता है. 'द लैंसेट रीजनल हेल्थ: साउथईस्ट एशिया' में प्रकाशित एक नई मेडिकल समीक्षा में डॉक्टरों के एक पैनल ने चेतावनी दी है कि केवल इस टेस्ट पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि HbA1c टेस्ट सीधे तौर पर ब्लड शुगर नहीं मापता, बल्कि यह पिछले दो-तीन महीनों के औसत शुगर लेवल को दर्शाता है. भारत में खून की कमी और हीमोग्लोबिन से संबंधित विकारों की व्यापकता को देखते हुए, यह टेस्ट अक्सर गलत परिणाम दे सकता है.
पैनल के सदस्य और फोर्टिस सेंटर फॉर डायबिटीज के चेयरमैन डॉ. अनूप मिश्रा के अनुसार, एनीमिया जैसी स्थितियों में HbA1c के नतीजे सटीक नहीं आते, जिससे या तो डायबिटीज का पता बहुत देर से चलता है या स्वस्थ व्यक्ति को गलत तरीके से डायबिटीज का मरीज घोषित कर दिया जाता है.
इसी तरह, मुंबई के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. शशांक जोशी ने बताया कि आयरन की कमी वाले मरीजों में केवल इस टेस्ट के भरोसे रहने से बीमारी की पहचान में चार साल तक की देरी हो सकती है, जो आगे चलकर किडनी और आंखों की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है.
विशेषज्ञों ने सिफारिश की है कि डायबिटीज की सटीक पहचान के लिए 'ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट' (OGTT) को ही 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाना चाहिए. इसमें खाली पेट और ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद ब्लड शुगर की जांच की जाती है.
पैनल ने सुझाव दिया है कि HbA1c का उपयोग केवल सहायक टेस्ट के रूप में किया जाना चाहिए, न कि अकेले. रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि केवल HbA1c के आधार पर भारत में डायबिटीज के मरीजों का आंकड़ा 200 मिलियन तक पहुंच जाता है, जबकि ब्लड ग्लूकोज टेस्ट के आधार पर यह संख्या लगभग 110 मिलियन है, जो राष्ट्रीय स्तर पर बीमारी के बोझ के अनुमानों में बड़े अंतर को दर्शाता है.