ब्रेक्सिट का एक दशक: घाटे में अर्थव्यवस्था, समाज में बिखराव
नई दिल्ली । डेस्क: ब्रिटिश जनता द्वारा यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने यानी ब्रेक्सिट के पक्ष में मतदान किए हुए एक दशक का समय बीत चुका है. दस साल पहले 23 जून 2016 को जब यह ऐतिहासिक जनमत संग्रह हुआ था, तब ब्रिटेन के भविष्य को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे. लेकिन आज दस साल बाद, ब्रिटेन एक गहरे आत्ममंथन और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है.
कीर स्टार्मर के इस्तीफे के बाद देश एक दशक के भीतर अपने सातवें प्रधानमंत्री का स्वागत करने की तैयारी में है. यह राजनीतिक उथल-पुथल साफ संकेत देती है कि डेविड कैमरन के इस्तीफे से शुरू हुआ राजनीतिक संकट आज भी थमा नहीं है. यूगोव (YouGov) के हालिया सर्वेक्षण के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि आज केवल 30 प्रतिशत ब्रितानी नागरिक ही ब्रेक्सिट को सही मानते हैं, जबकि 57 प्रतिशत का स्पष्ट मानना है कि यूरोपीय संघ छोड़ना एक गलत फैसला था. देश की बहुसंख्यक आबादी अब ब्रेक्सिट को एक मुकम्मल नाकामी के तौर पर देखने लगी है.
आर्थिक आत्मनिर्भरता के दावों के बीच सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था:
जनमत संग्रह के दौरान संप्रभुता, ब्रिटिश पाउंड की मजबूती, आर्थिक स्वतंत्रता और लालफीताशाही से मुक्ति जैसे जिन मुद्दों पर हफ्तों बहस चली थी, वे अब किसी आम सहमति पर पहुंचने के बजाय गतिरोध में बदल चुके हैं. बैंक ऑफ इंग्लैंड के हालिया आर्थिक विश्लेषण ने इन दावों की हवा निकाल दी है.
आंकड़ों के मुताबिक, यूरोपीय संघ से अलग होने के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में छह प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है. अर्थशास्त्रियों के बीच अब यह बहस का विषय नहीं रह गया है कि ब्रेक्सिट का खुमार उतर चुका है.
जिसे कभी सुनहरे भविष्य के सपने के रूप में बेचा गया था, वह अब 'ब्रेग्रेट' यानी ब्रेक्सिट के पछतावे में तब्दील हो चुका है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि ब्रेक्सिट की सबसे दर्दनाक और स्थायी विरासत आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक है, जिसने देश के ताने-बाने को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है.
मुख्यधारा की राजनीति में हावी होती विभाजनकारी भाषा:
पिछले दस वर्षों में ब्रिटेन की राजनीतिक संस्कृति, चरमपंथ के प्रति उसकी सहनशीलता और 'कौन अपना है और कौन बाहरी' के विमर्श ने एक बेहद जहरीला रूप अख्तियार कर लिया है. प्रवासियों, विशेषकर अश्वेतों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का ब्रिटेन में एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन ब्रेक्सिट ने इस अलगाववादी मानसिकता को एक नई वैधता दे दी.
यूरोपीय संघ की सदस्यता जैसे जटिल प्रशासनिक और आर्थिक सवाल को पूरी तरह से 'सीमा नियंत्रण' के मुद्दे में बदल दिया गया. इसके कारण प्रवासियों की राजनीति में एक ऐसा नैतिक उबाल आया जिसने दक्षिणपंथी ताकतों को मजबूत किया.
विशेषज्ञों का कहना है कि जो भाषा कभी राजनीति के हाशिए पर हुआ करती थी जैसे देश पर 'आक्रमण' हो रहा है, शरणार्थी एक रैकेट हैं या मुस्लिम समुदाय ब्रिटिश मूल्यों को नहीं मानता वह अब मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है.
सरकारी नीतियों और सड़कों पर बढ़ती हिंसा का दौर:
इस जहरीली बयानबाजी का असर केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकारी नीतियों में भी साफ झलकने लगा है. वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में सरकारों ने एक-दूसरे से ज्यादा सख्त दिखने की होड़ लगा दी. प्रवासियों को हिरासत में रखना, बचाव अभियानों का अपराधीकरण करना और शरणार्थियों की तुलना अपराधियों से करना अब सामान्य बात मान ली गई है.
'स्टॉप द बोट्स' जैसे राजनीतिक नारे अब सड़कों पर हिंसा का कारण बन रहे हैं. हाल ही में बेलफास्ट में भड़की हिंसा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जहां सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के बाद प्रवासियों के घरों और संपत्तियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया.
इस नफरत का सबसे बड़ा खामियाजा ब्रिटिश मुस्लिमों, विशेषकर महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें अपनी पहचान के कारण आए दिन सड़कों और ऑनलाइन मंचों पर भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है.
सोशल मीडिया और दुष्प्रचार की नई चुनौती:
इस सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने में डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया ने आग में घी का काम किया है. औद्योगिक पतन और आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे श्वेत कार्यशील वर्ग के गुस्से को चतुराई से प्रवासियों की तरफ मोड़ दिया गया.
ब्रेक्सिट अभियान की सफलता ने रणनीतिकारों को यह सिखा दिया कि पारंपरिक मीडिया को दरकिनार कर डेटा और एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के जरिए जनभावनाओं को कैसे प्रभावित किया जा सकता है. आज बोट फार्म्स और फेक न्यूज के जरिए लगातार दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है. हालांकि इन अभियानों के केंद्र में अक्सर मुस्लिम और प्रवासी होते हैं, लेकिन इसका अंतिम उद्देश्य सरकार और नीतियों पर नियंत्रण हासिल करना होता है.
आने वाले समय में ब्रिटेन के सामने आर्थिक सुधारों से भी बड़ी चुनौती अपने नागरिकों के बीच आपसी विश्वास को बहाल करने की होगी, क्योंकि केवल एक मजबूत अर्थव्यवस्था इस सामाजिक बिखराव को नहीं रोक सकती.