क्यूबा अमेरिकी विस्तारवाद के विरोध का प्रतीक है
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: जब पिछले महीने क्यूबा की पूरी बिजली व्यवस्था चरमरा गई और 10 मिलियन लोग अंधेरे में डूब गए, तो अमेरिकी मीडिया ने इसे एक विफल कम्युनिस्ट राज्य की 'अंतिम सांसें' करार दिया. लेकिन हकीकत में यह अंधेरा क्यूबा की विफलता से कहीं ज्यादा अमेरिकी विस्तारवाद और उसकी अमानवीय नाकेबंदी का नतीजा है. क्यूबा आज दुनिया के सामने अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर खड़ा है.
एक तरफ जहां क्यूबा ने दशकों से संकट के समय अपने डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को दुनिया के कोने-कोने में भेजकर 'एकजुटता के तर्क' को जीवित रखा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने बदले में उसे केवल समस्याएं भेजी हैं.
आज क्यूबा में जो ऊर्जा का गहरा संकट है, खाद्य पदार्थों की किल्लत है और दवाओं का अभाव है, वह प्राकृतिक नहीं बल्कि वाशिंगटन द्वारा थोपी गई एक सुनियोजित त्रासदी है. यह एक ऐसी क्रूर राजनीति है जहां एक महाशक्ति अपने पड़ोसी को केवल इसलिए भूखा मार देना चाहती है क्योंकि उसने उसके सामने झुकने से इनकार कर दिया है.
अमेरिका क्यूबा की मदद करना तो दूर, उन देशों के रास्ते में भी रोड़े अटका रहा है जो इस मानवीय संकट में उसकी सहायता करना चाहते हैं. हाल ही में रूसी तेल टैंकरों का पीछा करना और वेनेजुएला से आने वाली मदद को बाधित करना इसी विस्तारवादी सोच का हिस्सा है.
क्यूबा का 'अपराध' केवल इतना है कि वह एक कम्युनिस्ट देश है और सोवियत संघ के पतन के बाद भी उसने अपनी विचारधारा को नहीं छोड़ा.
अमेरिका के लिए क्यूबा का अस्तित्व उसके 'प्रभुत्व' पर एक कलंक की तरह है. यदि अमेरिका को क्यूबा की विचारधारा से इतनी ही नफरत है, तो उसे एक स्वस्थ वैचारिक और कूटनीतिक लड़ाई लड़नी चाहिए थी. लेकिन वैचारिक लड़ाई में पिछड़ने के बाद अमेरिका ने कुंठावश आर्थिक प्रतिबंधों को हथियार बना लिया है.
यह किसी अंतरराष्ट्रीय नीति से ज्यादा 'ब्लैकमेलिंग' के समान है, जिसका घोषित उद्देश्य क्यूबा की जनता को इतना प्रताड़ित करना है कि वे हार मानकर अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएं. यह सत्ता परिवर्तन (रजीम चेंज) की वही पुरानी और खतरनाक पटकथा है, जिसे अमेरिका दुनिया के कई हिस्सों में दोहरा चुका है.
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने इस साम्राज्यवादी खतरे को और अधिक स्पष्ट कर दिया है. ट्रंप का हालिया बयान कि वे क्यूबा को 'लेने' या 'मुक्त' करने का सम्मान पाना चाहते हैं, उनकी उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें वे पूरी दुनिया पर ओवल ऑफिस से बैठकर शासन करना चाहते हैं.
ट्रंप की नजर में क्यूबा कोई संप्रभु राष्ट्र नहीं, बल्कि एक संपत्ति है जिसे वे अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकते हैं. यह भाषा किसी लोकतांत्रिक नेता की नहीं, बल्कि एक आधुनिक विस्तारवादी की है जो विरोध करने वाले हर स्वर को कुचल देना चाहता है.
उनके विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस एजेंडे को और धार दे रहे हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य क्यूबा को घुटनों पर लाना है. लेकिन अमेरिका यह भूल जाता है कि क्यूबा ने उस समय भी दुनिया की मदद की जब वह खुद आर्थिक प्रतिबंधों की आग में झुलस रहा था. जमैका में लाखों मरीजों का इलाज करने वाले क्यूबाई डॉक्टर हों या पश्चिम अफ्रीका में इबोला से लड़ने वाले नर्स, क्यूबा ने हमेशा पूंजी के बजाय मानवता को प्राथमिकता दी है.
अमेरिका की इस नाकेबंदी ने क्यूबा की रगों में दौड़ने वाले तेल को तो रोका है, लेकिन उसके आत्मसम्मान को नहीं डिगा पाया है. क्यूबा का विरोध केवल एक शासन की रक्षा नहीं है, बल्कि उस संप्रभुता की रक्षा है जिसे अमेरिका अपने पैरों तले रौंदना चाहता है.
यह विडंबना ही है कि जो देश खुद को लोकतंत्र का मसीहा कहता है, वह महज 90 मील दूर बसे एक छोटे से द्वीप की जनता से बुनियादी दवाएं और भोजन छीनकर वहां 'लोकतंत्र' लाना चाहता है. क्यूबा आज भी अपने फटेहाल हाल में खड़ा होकर दुनिया को यह याद दिला रहा है कि साम्राज्यवाद का मुकाबला कैसे किया जाता है.
मटान्ज़ास बंदरगाह पर तेल लेकर पहुंचते रूसी जहाज और दुनिया भर के सामाजिक आंदोलनों का क्यूबा को मिलता समर्थन इस बात का प्रमाण है कि भले ही अमेरिका की नौसेना ने क्यूबा को घेर रखा हो, लेकिन दुनिया की सहानुभूति और एकजुटता आज भी इस छोटे से द्वीप के साथ है.
क्यूबा का अस्तित्व अमेरिका की उस विस्तारवादी नीति की विफलता का सबसे बड़ा स्मारक है, जो मानती है कि ओवल ऑफिस से पूरी दुनिया की नियति तय की जा सकती है.