क्या जमात के शफीकुर रहमान बनेंगे बांग्लादेश के अगले PM?
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले देश के सबसे बड़े इस्लामी दल, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने अपनी छवि और रणनीति में जो बदलाव किए हैं, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. बुधवार शाम ढाका में पार्टी के अमीर (प्रमुख) शफीकुर रहमान ने एक ऐसा चुनावी घोषणापत्र जारी किया, जिसने न केवल आर्थिक विशेषज्ञों को चौंका दिया है, बल्कि राजनीतिक पंडितों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सालों तक हाशिए पर रही यह पार्टी अब सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने वाली है.
रहमान ने वादा किया है कि यदि उनकी पार्टी जीतती है, तो 2040 तक बांग्लादेश की जीडीपी को चार गुना बढ़ाकर 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचाया जाएगा. इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए उन्होंने प्रौद्योगिकी आधारित कृषि, विनिर्माण, आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में भारी निवेश का रोडमैप पेश किया है. हालांकि, ढाका के अर्थशास्त्री इन वादों के वित्तीय आधार पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि जमात के लिए यह घोषणापत्र केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि अपनी आधुनिक और शासन-केंद्रित मंशा को जाहिर करने का एक तरीका है.
शेख हसीना के पतन के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने के लिए जमात-ए-इस्लामी ने खुद को एक गंभीर विकल्प के रूप में पेश किया है. सालों तक 'अछूत' मानी जाने वाली इस पार्टी के प्रति विदेशी राजनयिकों का नजरिया भी बदल गया है. हाल के महीनों में यूरोपीय, पश्चिमी और यहां तक कि भारतीय राजनयिकों ने भी शफीकुर रहमान के साथ खुले तौर पर मुलाकातें की हैं.
67 वर्षीय रहमान, जो पेशे से एक पूर्व सरकारी डॉक्टर हैं, 2019 में पार्टी की कमान संभालने के बाद से ही इसे एक नई दिशा देने में जुटे हैं. उनके नेतृत्व में जमात ने अपनी कट्टरपंथी छवि को पीछे छोड़कर खुद को 'सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति' के ध्वजवाहक के रूप में पेश करना शुरू किया है.
रहमान का सौम्य स्वभाव और जमीनी स्तर पर आपदाओं के समय उनकी सक्रियता ने उन्हें युवाओं के बीच 'दादू' (दादाजी) के रूप में लोकप्रिय बना दिया है. जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान जमात की सक्रिय भूमिका ने इसे मुख्यधारा की राजनीति में वापस ला खड़ा किया है, जहाँ अब इसका सीधा मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी से देखा जा रहा है.
हालांकि, जमात के लिए यह बदलाव इतना आसान नहीं है. पार्टी आज भी 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का साथ देने के अपने इतिहास और विवादित विरासत से जूझ रही है.
शफीकुर रहमान ने इस मुद्दे पर सावधानी बरतते हुए 'अतीत की गलतियों' के लिए सूक्ष्म रूप से माफी माँगने का संकेत दिया है, जिसे कुछ लोग राजनीतिक यथार्थवाद तो कुछ महज एक दिखावा मान रहे हैं. इसके अलावा, महिलाओं की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर अभी भी विरोधाभास कायम है. एक तरफ जमात समावेशिता की बात करती है और पहली बार किसी हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया है, वहीं दूसरी तरफ रहमान का यह बयान कि 'एक महिला पार्टी का शीर्ष पद नहीं संभाल सकती', उनकी विचारधारा की सीमाओं को उजागर करता है.
आलोचकों का कहना है कि जमात की संरचना आज भी पुरुष प्रधान है और यह उन महिलाओं की आकांक्षाओं के विपरीत है जिन्होंने हसीना विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.
विदेशी मोर्चे पर जमात की स्वीकार्यता बढ़ना एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है. भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में जमात के नेताओं को आमंत्रित किया जाना और अमेरिकी राजनयिकों द्वारा पार्टी के छात्र विंग के साथ संबंध सुधारने की इच्छा जताना यह संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब बांग्लादेश के भविष्य में जमात की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकता.
चुनाव में अब दो हफ्ते से भी कम का समय बचा है और शफीकुर रहमान के नेतृत्व में जमात-ए-इस्लामी ने खुद को एक ऐसी अनुशासित और संगठित शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है, जो बीएनपी के प्रभुत्व को चुनौती दे रही है.
चाहे नतीजा जो भी हो, यह स्पष्ट है कि शफीकुर रहमान ने जमात को केवल एक धार्मिक संगठन से बदलकर एक प्रमुख चुनावी दावेदार बना दिया है. अब देखना यह है कि क्या बांग्लादेशी मतदाता उनके '2 ट्रिलियन डॉलर' के सपने और 'सेवक' बनने के वादे पर भरोसा करेंगे या पार्टी का पुराना इतिहास उसकी राह का रोड़ा बनेगा.