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तीन कफ सिरपों पर प्रतिबंध

तीन कफ सिरपों पर प्रतिबंध: भारत सरकार ने WHO को आश्वस्त किया, निर्यात शून्य

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10 अक्टू. 2025, 05:19 AM 5 मिनट में पढ़ें 1

कफ सिरप
कफ सिरप

नई दिल्ली । डेस्क: भारत ने विश्व-स्वास्थ्य-संगठन को सूचित किया है कि कोल्ड्रिफ सहित तीनों कफ सिरपों का किसी भी देश को निर्यात् नहीं किया गया है. स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि देश में हाल ही में विवादों में फंसे तीन कफ सिरपों कोल्ड्रिफ, रेस्पिफ्रेशटीआर और रिलाइफ को तत्काल प्रभाव से बाजार से हटाने का आदेश जारी कर दिया गया है. साथ ही, इनकी निर्माण करने वाली कंपनियों को आगे उत्पादन न करने की सख्त हिदायत दी गई है.


इससे पहले WHO ने भारतीय अधिकारियों से सवाल किया था कि क्या इन सिरपों से जुड़ी बच्चों की मौतों का मामला दूसरे देशों तक फैला है. संगठन ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में सामने आई हालिया घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की, जहां कफ सिरप के सेवन से बच्चों में एक्यूट किडनी फेलियर और ब्रेन इंफ्लेमेशन जैसे गंभीर लक्षण नजर आए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये मामले ओरल सिरप के इस्तेमाल से सीधे जुड़े पाए गए हैं.


CDSCO के बुधवार के पत्र में यह भी जोर दिया गया कि इन तीनों उत्पादों का भारत से विदेशों में एक भी यूनिट निर्यात नहीं हुआ. सूत्रों के मुताबिक, जांच में इन सिरपों में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) जैसे हानिकारक प्रदूषक का कोई ठोस स्रोत या खराब कच्चे माल का इस्तेमाल साबित नहीं हुआ, लेकिन फिर भी सावधानी के तौर पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया. WHO ने घरेलू दवा बाजार में DEG/EG की स्क्रीनिंग में लापरवाही पर नाराजगी जाहिर की और वैश्विक जोखिमों की आशंका व्यक्त की.


मामले की गहराई से जांच के बीच ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के ड्रग नियंत्रकों को सतर्कता बरतने का निर्देश दिया. एडवाइजरी में कहा गया कि मध्य प्रदेश की घटनाओं के मद्देनजर कच्चे माल और तैयार दवाओं को बाजार में उतारने से पूर्व उनकी गुणवत्ता जांच अनिवार्य हो. हालिया टेस्टिंग में कई दवाओं को अयोग्य पाया गया, जहां कंपनियां रॉ मटेरियल के स्टैंडर्ड टेस्टिंग में ढिलाई बरत रही थीं. यह कदम दवा उद्योग में सुरक्षा मानकों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा प्रयास माना जा रहा है.


डीईजी प्रदूषण: वैश्विक स्तर पर दवाओं में घातक संकट की कहानी

डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) एक सस्ता सॉल्वेंट है, जो कभी-कभी प्रोपाइलीन ग्लाइकॉल की जगह गलती से दवाओं में मिल जाता है. यह विषाक्त पदार्थ किडनी फेलियर, ब्रेन डैमेज और मौत का कारण बनता है, खासकर बच्चों में. पिछले 80 वर्षों में विश्व भर में 14 से अधिक देशों में डीईजी से जुड़ी दवा विषाक्तता की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें नाइजीरिया, पनामा, हैती जैसे देश शामिल हैं. ये मामले दवा उद्योग की लापरवाही और नियामक कमजोरियों को उजागर करते हैं.


ऐतिहासिक घटनाएं: शुरुआत से सबक

डीईजी विषाक्तता का पहला बड़ा मामला 1937 में अमेरिका में सामने आया, जब सल्फानिलामाइड एलिक्सिर नामक दवा में इसे सॉल्वेंट के रूप में इस्तेमाल किया गया. इससे 100 से अधिक लोग मारे गए, ज्यादातर बच्चे. यह घटना अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के सख्त नियमों का आधार बनी. उसके बाद 1969 में दक्षिण अफ्रीका में एक कफ सिरप में डीईजी मिलने से कई मौतें हुईं. 1980 के दशक में बांग्लादेश और भारत में भी इसी तरह के मामले आए, जहां दवाओं में सस्ते विकल्प के चक्कर में यह प्रदूषण फैला.


पनामा में 2006 की घटना सबसे कुख्यात रही. यहां एक चीनी फैक्टरी से आयातित कच्चे माल के कारण कफ सिरप में डीईजी घुल गया, जिससे कम से कम 78 बच्चे मारे गए. जांच में पाया गया कि कंपनी ने सॉल्वेंट की गुणवत्ता जांच ही नहीं की. इसी तरह, 1990 में हैती में दवा प्रदूषण से सैकड़ों मौतें हुईं.


पिछले दो वर्षों में डीईजी प्रदूषण ने फिर से वैश्विक चिंता बढ़ाई. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, गाम्बिया में 2022 में दो दवाओं में डीईजी पाए जाने से 66 बच्चों की मौत हुई. उज्बेकिस्तान में 18 और इंडोनेशिया में 178 बच्चों की जान गई. ये मामले मुख्य रूप से कफ सिरप और अन्य ओरल दवाओं से जुड़े थे. WHO ने दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप और अफ्रीका क्षेत्रों में कई घटनाओं की पहचान की, जहां सस्ते सॉल्वेंट्स का इस्तेमाल बढ़ा.


2023 में भी नाइजीरिया और उज्बेकिस्तान में नए मामले सामने आए, जहां दवाओं में डीईजी/ईजी (एथाइलीन ग्लाइकॉल) की मौजूदगी से सैकड़ों प्रभावित हुए. विशेषज्ञों का कहना है कि विकासशील देशों में कच्चे माल की जांच की कमी मुख्य वजह है. WHO ने हाल ही में बच्चों की दवाओं के लिए डीईजी टेस्टिंग के नए तरीके विकसित किए हैं, ताकि ऐसी घटनाएं रोकी जा सकें.


ये वैश्विक मामले दवा कंपनियों को सॉल्वेंट की सख्त स्क्रीनिंग और नियामकों को निर्यात-आयात पर नजर रखने की याद दिलाते हैं. भारत जैसे देशों में हालिया मध्य प्रदेश की घटना भी इसी श्रृंखला का हिस्सा लगती है, जहां कफ सिरप से बच्चों की मौतें हुईं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, WHO और FDA जैसी एजेंसियां अब AI-आधारित टेस्टिंग को बढ़ावा दे रही हैं. फिर भी, सस्ते विकल्पों की लालच से बचना ही असली समाधान है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP