कांग्रेस ने अरावली समिति की निष्पक्षता पर उठाए सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने आशंका जताई है कि समिति की वर्तमान संरचना के कारण अरावली पारिस्थितिकी तंत्र पर मंडरा रहा खतरा अभी टला नहीं है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए जयराम रमेश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली मामले की नए सिरे से गहन समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन करना एक सकारात्मक कदम था, लेकिन इसमें मौजूदा और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों की अधिकता चिंताजनक है.
उन्होंने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सेवारत अधिकारियों को ही इस समिति का अध्यक्ष और सदस्य सचिव बनाया गया है, जिससे इसकी निष्पक्षता और स्वायत्तता पर बड़े सवाल उठते हैं.
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी समिति के सम्मानित सदस्यों की योग्यता पर नहीं, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली और मानसिकता पर एक टिप्पणी है.
जयराम रमेश ने अरावली के संरक्षण के लिए जन आंदोलन को और तेज करने की अपील की. उन्होंने याद दिलाया कि 2025 में शीर्ष अदालत के एक फैसले के बाद जनता, मीडिया और नागरिक समाज के भारी दबाव के कारण ही अदालत ने अपने कदम पीछे खींचे थे.
पूर्व मंत्री ने उम्मीद जताई कि यह नई समिति पुराने विवादित फैसलों पर मुहर लगाने का काम नहीं करेगी. उन्होंने कहा कि अरावली की परिभाषा बदलने का कोई ठोस आधार नहीं है और खुद भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) ने भी सितंबर 2025 में इस पुनर्परिभाषा के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था.
इसके बाद, दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने पुराने फैसले पर रोक लगा दी थी, जो इस नाजुक पर्यावरण के लिए बेहद विनाशकारी साबित हो सकता था.
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस रिपोर्ट की समीक्षा के लिए इस उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसमें अरावली पर्वत श्रृंखला के सीमांकन और परिभाषा को लेकर कई विसंगतियां थीं.
अदालत ने इस पैनल को वैज्ञानिक और पारिस्थितिक आधार पर एक निष्पक्ष समीक्षा करने का निर्देश दिया है. भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (ICFRE) की महानिदेशक कंचन देवी की अध्यक्षता वाली इस समिति को 31 अगस्त 2026 तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी है.
इस पांच सदस्यीय समिति में वन सर्वेक्षण, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और दिल्ली विश्वविद्यालय के कई जाने-माने विशेषज्ञ शामिल हैं, साथ ही बेंगलुरु के पर्यावरण विशेषज्ञ प्रोफेसर जगदीश कृष्णस्वामी और हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में जोड़ा गया है.
अब देखना यह होगा कि यह समिति पर्यावरण संरक्षण और सरकारी नीतियों के बीच संतुलन बनाने में कितनी सफल होती है.