कोल्ड्रिफ कफ सिरप कांड: डॉक्टर की जमानत याचिका खारिज
जबलपुर । डेस्क: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से शुरू हुए और पूरे राज्य और देश को झकझोर देने वाले 'कोल्ड्रिफ' कफ सिरप कांड में कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने इस मामले के मुख्य आरोपी और परासिया के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस. एस. ठाकुर की पहली नियमित जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है. न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मासूम बच्चों की जान से जुड़े इस गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और केंद्रीय नियामक निर्देशों की सरेआम अनदेखी के मामले में कोई भी न्यायिक नरमी नहीं बरती जा सकती.
करीब 45 वर्षों से चिकित्सा क्षेत्र में सक्रिय रहे डॉ. ठाकुर गत 7 मार्च 2026 से न्यायिक हिरासत में हैं और उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत गैर-इरादतन हत्या (धारा 105) जैसी अत्यंत गंभीर धाराएं लगाई गई हैं.
कफ सिरप में मिला मौत का 'जहर':
यह रूह कंपा देने वाला मामला उस समय सामने आया जब मध्य प्रदेश में कई मासूम बच्चों की अचानक किडनी खराब (एक्यूट किडनी इंजरी) होने के कारण दर्दनाक मौत हो गई. जब प्रशासनिक अमला हरकत में आया और लैबोरेटरी में 'कोल्ड्रिफ' कफ सिरप की जांच की गई, तो जो रिपोर्ट आई उसने सबके होश उड़ा दिए.
इस कफ सिरप में डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) नामक जानलेवा रसायन की मात्रा 46.28 प्रतिशत पाई गई, जबकि चिकित्सा मानकों के अनुसार इसकी अधिकतम सीमा मात्र 0.1 प्रतिशत ही होनी चाहिए थी.
डायथिलीन ग्लाइकोल एक बेहद जहरीला तत्व है जो सीधे किडनी को पूरी तरह नाकाम कर देता है. इस जहरीले बैच का निर्माण तमिलनाडु की 'श्रीसन फार्मास्युटिकल्स' द्वारा किया गया था, जिसके प्रबंध निदेशक रंगनाथन समेत कई अधिकारियों को पुलिस पहले ही सलाखों के पीछे भेज चुकी है.
प्रशासन की लापरवाही पर गिरी गाज:
मासूमों की मौत के बाद भड़के जनआक्रोश को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने भी इस मामले में कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की है. बाजार की निगरानी में गंभीर लापरवाही बरतने के आरोप में राज्य के उप औषधि नियंत्रक (डिप्टी ड्रग कंट्रोलर) शोभित खोष्टा को सस्पेंड कर दिया गया है. खोष्टा के साथ-साथ क्षेत्र के ड्रग इंस्पेक्टर्स भी जांच के दायरे में हैं, क्योंकि वे राज्य की दवा आपूर्ति श्रृंखला में 'गुड डिस्ट्रीब्यूशन प्रैक्टिसेज' (GDP) को लागू कराने में पूरी तरह नाकाम रहे.
अभियोजन पक्ष ने इस मामले में दवा बनाने वाली कंपनी, निगरानी रखने वाले अधिकारियों, स्थानीय वितरकों और अंत में इस जहरीली दवा को बच्चों के लिए लिखने वाले डॉक्टरों यानी पूरी व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है.
अदालत में बचाव और अभियोजन की तीखी बहस:
सुनवाई के दौरान डॉ. ठाकुर के बचाव में वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे ने दलील दी कि डॉक्टर का कोई आपराधिक इरादा नहीं था और उन्होंने किसी भी आर्थिक लाभ या कमीशन के बिना, केवल अच्छे विश्वास में यह दवा मरीजों को लिखी थी. बचाव पक्ष ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए तकनीकी दांव-पेंच के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि सरकार ने केवल दो दवाओं के मिश्रण (कॉम्बिनेशन) पर रोक लगाई थी, जबकि कोल्ड्रिफ में मौजूद तीन दवाओं का मिश्रण अभी भी विचाराधीन था.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य' मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि दवा निर्माण की कमियों या जहरीले कच्चे माल की मिलावट के लिए डॉक्टरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
इसके विपरीत, सरकारी वकील ने अदालत के सामने ऐसी सच्चाई रखी जिसने डॉक्टर की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. जांच में सामने आया कि डॉ. ठाकुर के बेटे (जो खुद एक पीडियाट्रिशियन हैं) को नागपुर के एक अस्पताल से फोन पर स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि छिंदवाड़ा क्षेत्र के कई बच्चे किडनी की गंभीर बीमारी लेकर आ रहे हैं. इसके बावजूद, डॉ. ठाकुर ने इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया, बच्चों की किडनी की जांच नहीं कराई और लगातार उस जानलेवा कफ सिरप को लिखते रहे.
न्यायिक समानता और जन-विश्वास की रक्षा:
न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल ने अपने आदेश में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि एक विशेषज्ञ डॉक्टर होने के नाते आवेदक की जिम्मेदारी सबसे बड़ी थी. उन्होंने 18 दिसंबर 2023 को जारी केंद्रीय नियामक की चेतावनियों के बावजूद चार साल से कम उम्र के संवेदनशील बच्चों को उच्च जोखिम वाला कॉम्बिनेशन प्रिस्क्राइब किया.
अदालत ने कहा कि इस दूषित दवा के कारण क्षेत्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जिसने स्वास्थ्य प्रणाली पर से जनता का भरोसा पूरी तरह उठा दिया है.
जब इस मामले से जुड़े स्थानीय मेडिकल स्टोर संचालकों और वितरकों की जमानत पहले ही खारिज हो चुकी है, तो मुख्य प्रिस्क्राइबिंग डॉक्टर को राहत देना न्यायिक समानता के खिलाफ होगा. हाईकोर्ट ने अब निचली अदालत को दवाओं और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम तथा बीएनएस के प्रावधानों के तहत ट्रायल को तेजी से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है.
कोल्ड्रिफ कफ सिरप कांड:
कोल्ड्रिफ कफ सिरप कांड भारतीय दवा इतिहास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सबसे दुखद और गंभीर मामलों में से एक है. यह मामला वर्ष 2026 में तब सुर्खियां बना जब मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और आसपास के इलाकों में कई मासूम बच्चों की अचानक एक्यूट किडनी इंजरी यानी किडनी पूरी तरह खराब होने के कारण दर्दनाक मौत हो गई. जांच में सामने आया कि इन बच्चों को 'कोल्ड्रिफ' नामक एक कफ सिरप पिलाया गया था, जो बच्चों की सर्दी-खांसी के लिए इस्तेमाल होता था.
जब इस कफ सिरप की सरकारी प्रयोगशालाओं में कड़ाई से जांच की गई, तो उसमें डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) नामक एक अत्यंत जहरीले और जानलेवा रसायन की मिलावट पाई गई. चिकित्सा मानकों के अनुसार इस रसायन की मात्रा सिरप में 0.1 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन कोल्ड्रिफ के इस जानलेवा बैच में इसकी मात्रा 46.28 प्रतिशत तक पाई गई, जो किसी भी इंसान, विशेषकर छोटे बच्चों के लिए एक घातक जहर की तरह थी.
इस भयावह कांड के तार तमिलनाडु की दवा निर्माता कंपनी 'श्रीसन फार्मास्युटिकल्स' से जुड़े थे, जिसने इस खतरनाक सिरप का निर्माण किया था. घटना के बाद देशव्यापी आक्रोश फैल गया, जिसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कंपनी के प्रबंध निदेशक रंगनाथन और कई कॉर्पोरेट अधिकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.
इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर दवा बेचने वाले 'अपना मेडिकल स्टोर' के मालिकों और बिचौलियों पर भी कानूनी शिकंजा कसा गया. इस त्रासदी ने राज्य की दवा निगरानी प्रणाली की पोल खोलकर रख दी, जिसके परिणामस्वरूप मध्य प्रदेश सरकार ने बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए डिप्टी ड्रग कंट्रोलर शोभित खोष्टा और कई क्षेत्रीय ड्रग इंस्पेक्टरों को सस्पेंड कर दिया.
इन अधिकारियों पर दवा आपूर्ति श्रृंखला में लापरवाही बरतने और 'गुड डिस्ट्रीब्यूशन प्रैक्टिस' को लागू न करने के आरोप लगे.
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू डॉक्टरों की लापरवाही का था. छिंदवाड़ा के परासिया क्षेत्र के एक नामी और 45 वर्षों का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ, डॉ. एस. एस. ठाकुर को भी इस मामले में मुख्य सह-आरोपी बनाया गया और भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत गिरफ्तार किया गया.
जांच में यह साबित हुआ कि केंद्रीय नियामक द्वारा चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसे फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन वाली दवाओं पर रोक लगाने की चेतावनी जारी की जा चुकी थी, और नागपुर के डॉक्टरों ने भी क्षेत्रीय स्तर पर बच्चों की किडनी खराब होने के शुरुआती लक्षण मिलने पर अलर्ट भेजा था. इसके बावजूद डॉक्टर ने बच्चों की कोई जरूरी जांच नहीं कराई और लगातार वह जहरीला कफ सिरप लिखते रहे.
इस कांड ने न केवल दवा निर्माताओं, बल्कि दवा बेचने वाली दुकानों, सरकारी नियामक संस्थाओं और डॉक्टरों की मिलीभगत या लापरवाही के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जिससे देश में फार्मास्युटिकल सुरक्षा और डॉक्टरों की जवाबदेही को लेकर एक नई और बेहद सख्त कानूनी बहस शुरू हो गई है.