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शादी के दौरान जन्मी संतान सिर्फ DNA जांच से अवैध नहीं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

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04 अक्टू. 2026, 04:21 AM 2 मिनट में पढ़ें 3

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: वैध विवाह के दौरान जन्म लेने वाले बच्चे की कानूनी पहचान और गरिमा को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर किसी बच्चे को उसके पिता की वैध संतान मानने से इनकार नहीं किया जा सकता. 


बच्चे की वैधता से जुड़ी कानूनी धारणा को खारिज करने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि गर्भधारण के समय पति और पत्नी के बीच कोई संपर्क या साथ रहने की गुंजाइश ही नहीं थी.

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यह मामला दुर्ग जिले से जुड़ा है, जहां एक व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि एक निजी डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट से उसे पता चला है कि वह अपनी नाबालिग बेटी का जैविक पिता नहीं है. इसके आधार पर उसने बच्ची के शैक्षणिक और सरकारी दस्तावेजों से अपना नाम हटाने की मांग की थी. 


फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. याचिकाकर्ता का विवाह मई 2005 में हुआ था और सितंबर 2006 में बच्ची का जन्म हुआ, जबकि बाद में 15 नवंबर 2016 में दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया था.


मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की युगल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया. पीठ ने कहा कि बच्चे के अधिकार, पहचान और सामाजिक गरिमा से जुड़े विषयों में केवल जैविक संबंधों को एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता.


अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 का संदर्भ देते हुए रेखांकित किया कि कानून वैध विवाह के दौरान जन्मी संतान की वैधता का मजबूत पक्ष लेता है. चूंकि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहा कि गर्भधारण की अवधि के दौरान उसका अपनी पत्नी से कोई संपर्क संभव नहीं था, इसलिए सिर्फ डीएनए रिपोर्ट के बल पर कानूनी पिता होने की स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP