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बदलते समय के साथ कानूनों का अद्यतन आवश्यक- गृह मंत्री

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20 मार्च 2026, 01:12 AM 4 मिनट में पढ़ें 2

विजय शर्मा
विजय शर्मा

रायपुर । संवाददाता: 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026' में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्दोष होने के प्रमाण का भार (Burden of Proof) अब आरोपी पर होगा. मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में तैयार इस विधेयक को उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा ने सदन में प्रस्तुत किया. विधेयक पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1968 से लागू पुराने प्रावधान वर्तमान परिस्थितियों में अपर्याप्त हो गए थे. 


उन्होंने कहा कि बस्तर और सरगुजा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में धर्मांतरण के कारण उपजे सामाजिक तनाव और वर्ग संघर्ष को रोकने के लिए एक सुदृढ़ और स्पष्ट कानूनी ढांचे की आवश्यकता थी, जिससे सामाजिक समरसता बनी रहे.

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इस नए कानून के तहत अब धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को पूरी तरह से आधिकारिक और सार्वजनिक बनाया गया है. अब स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन करना होगा, जिसके बाद आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी और गहन जांच के बाद ही प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा. 


कानून में यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी व्यक्ति पर कोई दबाव, प्रलोभन या भय न हो. इसके अलावा, धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं के लिए भी पंजीकरण और वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया है. 


विशेष बात यह है कि इस प्रक्रिया में ग्राम सभाओं को भी शामिल किया गया है ताकि स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता बनी रहे और विवाह को धर्मांतरण का आधार नहीं माना जाएगा.


अवैध धर्मांतरण पर लगाम लगाने के लिए विधेयक में बेहद कड़े दंड और जुर्माने का प्रावधान है. सामान्य अवैध धर्मांतरण के मामलों में 7 से 10 वर्ष के कारावास के साथ 5 लाख रुपये तक का जुर्माना तय किया गया है. यदि मामला महिलाओं, नाबालिगों या अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से जुड़ा है, तो सजा 10 से 20 वर्ष तक की कैद और 10 लाख रुपये जुर्माने तक हो सकती है. 


सामूहिक धर्मांतरण के दोषियों को 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा दी जाएगी. वहीं, प्रलोभन या भय दिखाकर धर्मांतरण कराने पर 30 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. यदि कोई लोक सेवक इस अपराध में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे भी कठोर कारावास भुगतना होगा.


विधेयक में पीड़ितों के संरक्षण और न्याय पर भी विशेष बल दिया गया है. दबाव या धोखे से धर्म परिवर्तन के शिकार व्यक्तियों को न्यायालय के माध्यम से क्षतिपूर्ति दिलाने की व्यवस्था की गई है. 


मामलों की जांच उप-निरीक्षक या उससे वरिष्ठ स्तर के अधिकारी करेंगे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्दोष होने के प्रमाण का भार (Burden of Proof) अब आरोपी पर होगा. गृह मंत्री विजय शर्मा ने विश्वास जताया कि यह कानून राज्य की पारंपरिक सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने के साथ-साथ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखने में एक मील का पत्थर साबित होगा.


Burden of Proof क्या है


'बर्डन ऑफ प्रूफ' (Burden of Proof) जिसे हिंदी में 'प्रमाण का भार' या 'सिद्ध करने का दायित्व' कहा जाता है, कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है जो यह निर्धारित करता है कि अदालत में किसी दावे या तथ्य को सच साबित करने की जिम्मेदारी किस पक्ष पर होगी. 


सामान्य कानूनी सिद्धांत के अनुसार, "जो आरोप लगाता है, उसे ही साबित करना पड़ता है" (Ei incumbit probatio qui dicit, non qui negat). उदाहरण के लिए, यदि पुलिस किसी पर चोरी का आरोप लगाती है, तो पुलिस को सबूत पेश करने होंगे कि चोरी हुई है, न कि आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसने चोरी नहीं की है. 


हालांकि, विशिष्ट कानूनों जैसे हालिया छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 या भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में इस भार को उलट दिया जाता है, जहाँ आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करनी पड़ती है.


यह सिद्धांत दुनिया के लगभग उन सभी देशों में लागू है जहाँ एक संगठित न्याय प्रणाली मौजूद है. विशेष रूप से भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों सहित 'कॉमन लॉ' (Common Law) और 'सिविल लॉ' (Civil Law) दोनों प्रणालियों वाले देशों में इसे कानूनी प्रक्रिया का अभिन्न अंग माना जाता है. 


भारत में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act, 1872) की धारा 101 से 114 तक इसके बारे में विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं. 


आपराधिक मामलों में यह भार आमतौर पर 'संदेह से परे' (Beyond reasonable doubt) साबित करना होता है, जबकि दीवानी या सिविल मामलों में यह 'संभावनाओं की प्रधानता' (Preponderance of probabilities) पर आधारित होता है. 


सरल शब्दों में, यह वह कानूनी तंत्र है जो सुनिश्चित करता है कि न्याय प्रक्रिया केवल सुनी-सुनाई बातों पर नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हो.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP