पोटा केबिन में दो छात्रों की मौत, लापरवाही के आरोप पर हड़कंप
बीजापुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए स्थापित किए गए सरकारी पोटा केबिनों और आश्रमों की व्यवस्था पर दो छात्रों की अलग-अलग घटनाओं में हुई मौत के बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. दोनों बच्चों की मौत इलाज के दौरान ज़िला अस्पताल में हुई, जिसके बाद परिजनों ने चिकित्सा लापरवाही को उनकी मृत्यु का कारण बताया है.
पहली घटना: आवापल्ली के पोटा केबिन आश्रम में छठी कक्षा की छात्रा मनीषा सेमला (ग्राम गुंडम) बीमार पड़ गई. परिजनों के अनुसार, आश्रम अधिकारियों ने उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद ही उन्हें सूचित किया. मनीषा को पहले आवापल्ली अस्पताल ले जाया गया और फिर गंभीर हालत में बीजापुर ज़िला अस्पताल रेफर किया गया, जहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई.
मृतका के रिश्तेदारों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने आश्रम प्रबंधन पर घोर लापरवाही का आरोप लगाया है. उनका दावा है कि मनीषा को समय पर चिकित्सा सहायता या नियमित स्वास्थ्य जाँच नहीं मिली, जिससे उनकी बीमारी का पता पहले लगाया जा सकता था. जनपद सदस्य मनोज अवालम ने कहा, "इस मौत को रोका जा सकता था. बच्चे को समय पर उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिली. नियमित स्वास्थ्य जाँच की स्पष्ट रूप से उपेक्षा की गई."
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. बीआर पुजारी ने बताया कि मनीषा को जब ज़िला अस्पताल लाया गया तो उनकी हालत बेहद गंभीर थी. "उनका हीमोग्लोबिन स्तर केवल 4 ग्राम था और ऑक्सीजन सैचुरेशन भी गंभीर रूप से कम था. उन्हें साँस लेने में दिक्कत हो रही थी. उन्हें एक दिन पहले ही रेफर किया गया था लेकिन समय पर नहीं लाया गया. यदि उन्हें जल्दी भर्ती किया जाता तो रक्त आधान से उनकी जान बचाई जा सकती थी," उन्होंने कहा.
दूसरी घटना: एक अन्य घटना में, गुंडम छात्रावास में रह रहे ताड़मेड़ गाँव के एक छात्र की भी ज़िला अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई. डॉक्टरों ने पुष्टि की कि छात्र की मृत्यु डेंगू बुखार के कारण हुई है. छात्र को शनिवार से भर्ती किया गया था, लेकिन इलाज के बावजूद उसकी हालत बिगड़ गई थी.
इन दो मौतों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दूर-दराज के बच्चों के लिए बने इन आवासीय विद्यालयों की स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रबंधन की गुणवत्ता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.