छत्तीसगढ़ में नदियों के वैज्ञानिक पुनर्जीवन का दावा
बिलासपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य की प्रमुख नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन को लेकर उठाए जा रहे कदमों की विस्तृत जानकारी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के समक्ष रखी है. सरकार ने अदालत को बताया कि पूरे राज्य में विज्ञान आधारित नदी पुनर्जीवन अभियान शुरू किया गया है, जिसके तहत प्रत्येक जिले में प्रमुख नदियों के लिए अलग-अलग पुनरुद्धार योजनाएं तैयार की जा रही हैं. इन योजनाओं में नदियों के उद्गम स्थलों का जियो-टैगिंग, वैज्ञानिक अध्ययन, भूजल और जल गुणवत्ता की निगरानी, नदी तट संरक्षण तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के समन्वय से संरक्षण कार्यों को अमल में लाया जाएगा.
यह जानकारी मुख्य सचिव की ओर से 7 मई को हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन में दायर हलफनामे में दी गई है. हलफनामे के अनुसार, मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय समिति ने 15 जून को सभी जिलों की प्रगति की समीक्षा की. बैठक में जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए गए कि वे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नदी पुनर्जीवन योजनाएं तैयार करें, पीएम गति शक्ति पोर्टल पर सभी नदी उद्गम स्थलों का मानचित्रण पूरा करें, तकनीकी उप-समितियों का गठन करें तथा नदी के प्रवाह, भूजल स्तर और जल गुणवत्ता की नियमित वैज्ञानिक निगरानी सुनिश्चित करें.
सरकार ने बताया कि अधिकांश जिलों में नदी उद्गम स्थलों का मानचित्रण पूरा हो चुका है, जबकि शेष स्थानों पर यह कार्य अंतिम चरण में है. अधिकांश उद्गम स्थलों की जियो-टैगिंग भी पूरी कर ली गई है. पुनर्जीवन योजनाओं को वैज्ञानिक आधार देने के लिए छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (सीएसवीटीयू), भिलाई, एनआईटी रायपुर और आईआईटी रुड़की जैसे तकनीकी संस्थानों की सेवाएं ली जा रही हैं.
केलो नदी के लिए 10 हजार से अधिक संरक्षण कार्य प्रस्तावित
हलफनामे के अनुसार रायगढ़ जिले ने केलो नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की है. जिला खनिज न्यास (DMFT), मनरेगा, कैम्पा (CAMPA) और विभिन्न विभागीय योजनाओं के तहत 10 हजार से अधिक संरक्षण कार्य प्रस्तावित किए गए हैं. इनमें से 1,400 से अधिक कार्य पूरे भी किए जा चुके हैं. सीएसवीटीयू भिलाई नदी के वैज्ञानिक अध्ययन में सहयोग कर रहा है और संरक्षण कार्यों का जियो-टैग दस्तावेज भी तैयार किया गया है.
लीलागर नदी के लिए CSR से 7.77 करोड़ का प्रस्ताव
कोरबा जिले में लीलागर नदी के उद्गम स्थल खल्लारी गांव का जियो-टैगिंग पूरा हो चुका है. सरकार ने बताया कि एसईसीएल के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड से करीब 7.77 करोड़ रुपये की लागत से पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन विकास का प्रस्ताव तैयार किया गया है. इसके अलावा डीएमएफटी, स्वच्छ भारत मिशन और वित्त आयोग की राशि से नदी तट संरक्षण, गाद निकालने और वैज्ञानिक निगरानी का कार्य भी किया जाएगा.
हसदेव नदी के उद्गम क्षेत्र का होगा पर्यावरण अनुकूल विकास
कोरिया जिले में हसदेव नदी के उद्गम स्थल मेंद्रा कला गांव के लिए व्यापक पुनर्जीवन योजना तैयार की गई है. सरकार धार्मिक महत्व वाले इस क्षेत्र का विकास पर्यावरण अनुकूल तरीके से करना चाहती है. यहां होम-स्टे जैसी सीमित सुविधाएं विकसित करने के साथ वृक्षारोपण, गाद हटाने, भूजल निगरानी और जलग्रहण क्षेत्र के उपचार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
मांड नदी के लिए पर्यटन नहीं, संरक्षण को प्राथमिकता
सरगुजा जिले में मांड नदी का उद्गम गेरसा गांव के समीप वन क्षेत्र में स्थित है. सरकार ने अदालत को बताया कि इस संवेदनशील क्षेत्र में पर्यटन आधारित विकास नहीं किया जाएगा. इसके बजाय जलग्रहण क्षेत्र के उपचार, नदी तट संरक्षण, गाद हटाने, जल संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रभावित न हो.
तांदुला नदी का वन्यजीव क्षेत्र को ध्यान में रखकर होगा जीर्णोद्धार
उत्तर बस्तर कांकेर जिले में तांदुला नदी का उद्गम वन्यजीव आवास क्षेत्र में स्थित है. इसलिए यहां पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हुए पुनर्जीवन कार्य किए जाएंगे. सरकार ने बताया कि उद्गम स्थल का मानचित्रण और जियो-टैगिंग पूरी होने के बाद विस्तृत पुनर्जीवन योजना तैयार की जा रही है.
शिवनाथ नदी के संरक्षण पर 22 करोड़ से अधिक खर्च
मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में शिवनाथ नदी आरक्षित वन क्षेत्र से निकलती है. सरकार ने अदालत को बताया कि नदी तट संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण कार्यों के लिए राज्य आपदा राहत कोष से 21.91 करोड़ रुपये के प्रस्ताव भेजे गए हैं. वहीं 22 करोड़ रुपये से अधिक के संरक्षण कार्य पूरे किए जा चुके हैं, जबकि 52 करोड़ रुपये से अधिक के अतिरिक्त प्रस्ताव विचाराधीन हैं. नदी के जल प्रवाह की निगरानी के लिए आधुनिक उपकरण भी लगाए गए हैं.
अरपा, सोन, टिपन, पैरी और महानदी के लिए भी तैयार हो रही योजनाएं
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में अरपा, सोन और टिपन नदियों के पुनर्जीवन की अलग-अलग योजनाएं बनाई गई हैं. अरपा नदी के उद्गम स्थल के विकास के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है. वहीं सोन और टिपन नदी के उद्गम स्थलों का संरक्षण धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण अनुकूल तरीके से किया जाएगा.
सरकार ने बताया कि गरियाबंद की पैरी नदी तथा धमतरी की महानदी के संरक्षण के लिए भी विभागीय योजनाओं, मनरेगा, डीएमएफटी, सीएसआर और स्वच्छ भारत मिशन के फंड का समन्वय किया जा रहा है. इन परियोजनाओं में सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम, जलग्रहण क्षेत्र विकास, वृक्षारोपण, गाद निकालने, नदी तट विकास, भूजल पुनर्भरण और वैज्ञानिक निगरानी जैसे कार्य शामिल हैं.
जुलाई में होगा राज्य स्तरीय 'स्रोत महोत्सव'
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि नदी उद्गम स्थलों के संरक्षण को लेकर जनजागरूकता बढ़ाने तथा विभिन्न विभागों, तकनीकी संस्थानों और पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से जुलाई के अंतिम सप्ताह में राज्य स्तरीय स्रोत महोत्सव और एक विशेष कार्यशाला आयोजित की जाएगी.
अरपा नदी पर पुराने आदेश के पालन पर मांगा जवाब
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने माना कि प्रथम दृष्टया राज्य सरकार ने अदालत के पूर्व निर्देशों के अनुपालन की दिशा में पर्याप्त प्रगति दिखाई है. हालांकि सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि सरकार ने 22 जनवरी 2020 के उस आदेश के पालन की जानकारी हलफनामे में नहीं दी, जिसमें अरपा नदी के उद्गम स्थल से दो किलोमीटर के दायरे में दोनों ओर 100 मीटर तक किए गए अवैध अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे.
इस पर राज्य सरकार ने अदालत से अतिरिक्त समय मांगा. हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को इस संबंध में अलग से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. अदालत ने सभी पक्षों को भी सरकार के अनुपालन हलफनामे पर अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति देते हुए जनहित याचिका की अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित की है.