छत्तीसगढ़: बस्तर के पोटा केबिनों में छात्राओं के सुरक्षा पर सवाल
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा की लौ जलाने के लिए बनाए गए पोटा केबिन (आवासीय विद्यालय) अब मासूम बच्चियों की सुरक्षा को लेकर सवालों के घेरे में हैं. बस्तर संभाग के इन सरकारी कन्या आश्रमों से एक के बाद एक सामने आ रही यौन शोषण की घटनाओं ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है.
ताज़ा मामला तीन छात्राओं के गर्भवती पाए जाने का है, जिसके बाद शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन में अफरा-तफरी का माहौल है. जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई के बजाय केवल खानापूर्ति किए जाने से दोषियों के हौसले बढ़ रहे हैं, जिसका सीधा असर यहां पढ़ रही आदिवासी छात्राओं के भविष्य और उनकी सुरक्षा पर पड़ रहा है.
यह पहली बार नहीं है जब इन सुरक्षित माने जाने वाले आवासीय परिसरों से ऐसी दिल दहला देने वाली खबरें आई हों. इससे पूर्व भी सुकमा और जगदलपुर जैसे इलाकों में मासूमों को हवस का शिकार बनाया गया है.
जुलाई 2023 में सुकमा के एक पोटा केबिन में पहली कक्षा की छात्रा के साथ हुई दरिंदगी और एर्राबोर के कन्या विद्यालय में छह साल की बच्ची के साथ चपरासी के पति द्वारा किया गया दुष्कर्म, सुरक्षा तंत्र की विफलता के बड़े प्रमाण हैं.
वहीं 2019 में एक 14 वर्षीय छात्रा के गर्भवती होने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अवकाश के दौरान भी ये बच्चियां अपनों के ही बीच सुरक्षित नहीं हैं.
पोटा केबिन मूल रूप से उन दूरस्थ और माओवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए तैयार किए गए थे जहाँ परिवहन और बुनियादी ढांचों का अभाव है. लेकिन अब इन केंद्रों में पुरुषों की अनियंत्रित आवाजाही और महिला अधीक्षिकाओं के परिजनों का वहां निवास करना बड़ी चुनौती बन गया है.
प्रशासनिक गलियारों में अब यह मांग उठने लगी है कि इन आश्रमों को पूर्णत 'पुरुष मुक्त' क्षेत्र घोषित किया जाए और केवल महिला कर्मचारियों की ही तैनाती हो.
साथ ही, बच्चियों की नियमित काउंसलिंग और आने-जाने के रिकॉर्ड की सख्त निगरानी को अनिवार्य करने की आवश्यकता है, ताकि अभिभावकों का भरोसा इन सरकारी संस्थानों पर फिर से कायम हो सके.