बैल तस्करों पर शिकंजा, 5 गिरफ्तार, ग्रामीणों में उबाल
कोरबा । संवाददाता: जशपुर जिले के सरहदी इलाके में पशु तस्करी का एक काला साया मंडरा रहा था, लेकिन कोरबा के उरगा थाने की पुलिस टीम ने फुर्ती दिखाते हुए इसे कुचल दिया. पांच संदिग्धों को हिरासत में ले लिया गया है, जो अवैध तरीके से सात बैलों को उत्तर प्रदेश के बूचड़खानों तक पहुंचाने की साजिश रच रहे थे.
इस घटना ने स्थानीय किसानों और ग्रामीणों के बीच गुस्से की लहर पैदा कर दी है, जो पशु संरक्षण को लेकर पहले से ही सतर्क हैं.
सूचना का जाल बिछाकर पुलिस ने ग्राम सराईपाली के रिवापार पंचायत क्षेत्र में नाकेबंदी की. मुखबिर की टिप से अलर्ट हुई टीम ने सफेद पिकअप वाहन को घेर लिया, जिसमें बैलों को अमानवीय हालात में ठूंसकर ले जाया जा रहा था. वाहन चालक और उसके साथियों से सख्ती से पूछताछ की गई, तो खुलासा हुआ कि ये लोग जशपुर से ही मवेशियों को चुपके-चुपके लोड कर सीमापार भेज रहे थे.
तस्करी का मकसद साफ था बूचड़खानों में इनकी बिक्री और क्रूर हत्या.
जांच के दौरान पुलिस को कोई भी कानूनी कागजात या परमिट नहीं मिले, जो पशु परिवहन के लिए अनिवार्य होते हैं. तुरंत कार्रवाई में वाहन जब्त कर लिया गया और बैलों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया.
थाना प्रभारी ने बताया कि यह अभियान पशु क्रूरता रोकने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान का हिस्सा है. आरोपी अब न्यायिक हिरासत में हैं, और आगे की पूछताछ से तस्करी के बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकता है.
ग्रामीण समुदाय ने इस कार्रवाई की सराहना की है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी है कि ऐसी घटनाओं पर नकेल कसने के लिए और सतर्कता बरती जाए.
भारत में पशु संरक्षण कानून
भारत में पशु संरक्षण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है. देश में पशुओं की रक्षा के लिए कई कानून मौजूद हैं, जो क्रूरता को रोकने, वन्यजीवों की सुरक्षा और पशु कल्याण को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं. ये कानून केंद्र और राज्य स्तर पर लागू होते हैं, और इनका उद्देश्य पशुओं को अनावश्यक पीड़ा से बचाना है.
1. पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960)
यह भारत का मुख्य पशु संरक्षण कानून है, जो पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए बनाया गया. अधिनियम के अनुसार:
पशुओं को अनावश्यक दर्द या यातना देना अपराध है.
इसमें पशु परिवहन, प्रयोगशालाओं में उपयोग, प्रदर्शन आदि पर प्रतिबंध लगाए गए हैं.
केंद्र सरकार को पशु कल्याण बोर्ड (Animal Welfare Board of India - AWBI) स्थापित करने का निर्देश दिया गया, जो जागरूकता फैलाने और नियम लागू करने का काम करता है.
दंड: पहली बार अपराध पर 50 रुपये तक जुर्माना, दोहराने पर 6 महीने की जेल और 100 रुपये जुर्माना.
यह अधिनियम पूरे भारत (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) में लागू है.
2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wild Life Protection Act, 1972)
यह कानून जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों की रक्षा के लिए है. प्रमुख प्रावधान:
शिकार, जहर देना या फंसाना निषिद्ध.
संरक्षित क्षेत्र (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य) में प्रवेश पर नियंत्रण.
अनुसूची-1 के जानवरों (जैसे बाघ, हाथी) की हत्या पर कठोर दंड: 3-7 वर्ष की जेल और भारी जुर्माना.
यह अधिनियम समय-समय पर संशोधित होता रहा है, जैसे 2002 और 2006 में.
राज्य-स्तरीय कानून: गोवंश संरक्षण अधिनियम
कई राज्यों में गाय, बैल आदि के वध पर प्रतिबंध है, जो धार्मिक संवेदनशीलता से प्रेरित:
उत्तराखंड गोवंश संरक्षण अधिनियम, 2007: गायों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध, दंड में 3-10 वर्ष की जेल.
अन्य राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा में समान कानून.
ये केंद्र के दिशानिर्देशों पर आधारित हैं.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पशु अधिकारों की शुरुआत ब्रिटिश काल से हुई. 1860 में पहला कानून बना, जो क्रूरता पर प्रतिबंध लगाता था, लेकिन आश्रय के लिए धन नहीं था. 1861 में पशु संरक्षण सोसाइटी की स्थापना हुई. स्वतंत्र भारत में 1960 का अधिनियम मील का पत्थर साबित हुआ.
चुनौतियां और सुधार की मांग
हालांकि कानून मजबूत हैं, लेकिन कार्यान्वयन में कमी है. पशु तस्करी, अवैध वध और अमानवीय परिवहन आम हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि 1960 के अधिनियम में संशोधन जरूरी है, जैसे कठोर दंड और बेहतर निगरानी. पशु कल्याण बोर्ड जन जागरूकता पर जोर दे रहा है.