HC: महिला की गरिमा से खिलवाड़ गंभीर अपराध, अग्रिम जमानत खारिज
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि महिला के घर के भीतर यौन उत्पीड़न के आरोप न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि यह उसकी गरिमा और सुरक्षा पर भी गंभीर प्रहार हैं. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकल पीठ ने यौन उत्पीड़न, आपराधिक अतिचार और आपराधिक धमकी के आरोपी एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है.
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब किसी महिला के साथ उसके अपने घर की सीमाओं के भीतर इस तरह का कृत्य किया जाता है, तो यह समाज और कानून की नजर में एक बेहद गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, जिसमें किसी भी प्रकार की राहत देना न्यायोचित नहीं है.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला अक्टूबर 2025 में घटित घटनाओं पर आधारित है. पीड़िता ने पुलिस में दर्ज अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता, जिसे वह पिछले दो वर्षों से जानती थी, 13 अक्टूबर 2025 को नशे की हालत में उसके घर पहुंचा और अभद्र व्यवहार किया.
इसके दो दिन बाद, जब पीड़िता का पति घर पर मौजूद नहीं था, आरोपी जबरन घर में घुस गया. उसने महिला के प्रति अपनी संलिप्तता जाहिर की और जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ लिया. जब पीड़िता ने शोर मचाया, तो आरोपी ने उसका मुंह दबा दिया और उसे व उसके पति को जान से मारने की धमकी दी.
आरोपी ने भागने से पहले दरवाजे की कुंडी भी तोड़ दी और बेहद अश्लील भाषा का प्रयोग किया.
अदालत में याचिकाकर्ता के वकील चितेंद्र सिंह ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है. उन्होंने दलील दी कि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे, जिसके प्रमाण के रूप में व्हाट्सएप चैट और तस्वीरें मौजूद हैं.
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि प्राथमिकी दर्ज कराने में लगभग तीन महीने की देरी हुई है, जिससे पूरी कहानी संदिग्ध लगती है. उन्होंने आरोप लगाया कि पीड़िता और उसका पति याचिकाकर्ता से अवैध रूप से पैसों की मांग कर रहे थे और मांग पूरी न होने पर यह मामला दर्ज कराया गया.
वहीं, राज्य सरकार की ओर से वकील रीतिका वर्मा ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया. उन्होंने कहा कि मामला बेहद संवेदनशील और यौन प्रकृति का है, इसलिए आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जानी चाहिए.
एफआईआर में हुई देरी को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि पीड़िता डर, सामाजिक शर्म और आरोपी की धमकियों के कारण तुरंत पुलिस के पास नहीं जा सकी थी. कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि पीड़िता द्वारा बताई गई देरी का कारण प्रथम दृष्टया उचित है. अदालत ने आरोपी की भूमिका और अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसे अग्रिम जमानत के अयोग्य पाया.