RTE एडमिशन में देरी पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सख्त
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के कार्यान्वयन को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है, जिससे हजारों गरीब और वंचित बच्चों का शैक्षणिक भविष्य अधर में लटक गया है. इस पूरे मामले में जहां छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है, वहीं निजी स्कूल संचालकों ने स्कूल शिक्षा विभाग के विवादित नीतिगत बदलावों को दाखिलों में आई भारी गिरावट का मुख्य कारण बताया है.
निजी स्कूलों में आरटीई के तहत होने वाले प्रवेशों को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने देरी से चल रही दाखिला प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त की. कोर्ट में जमा किए गए शपथ पत्र में राज्य सरकार ने बताया कि इस साल आरटीई प्रवेश प्रक्रिया अगस्त तक जारी रहेगी.
इस पर अदालत ने कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा, "जब शैक्षणिक सत्र अप्रैल में ही शुरू हो चुका है, तो ऐसे में ये गरीब बच्चे पढ़ाई कब शुरू करेंगे और उनका पाठ्यक्रम कैसे पूरा होगा? क्या सरकार इनके लिए कोई विशेष व्यवस्था करने जा रही है?"
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 33 जिलों में दूसरे चरण की लॉटरी के बाद 9,984 खाली सीटों के लिए 1,174 छात्रों का चयन किया गया था. लेकिन दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता का कहना है कि शिक्षा विभाग द्वारा "एंट्री क्लास" के नियमों में अचानक किए गए बदलाव से असली समस्या पैदा हुई है.
राजीव गुप्ता के अनुसार, पहले हर साल लगभग 80,000 बच्चों को आरटीई के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश मिलता था, लेकिन इस साल यह संख्या घटकर महज 22,000 पर सिमट गई है.
इस एक नीतिगत फैसले के कारण अकेले इस वर्ष 60,000 गरीब परिवार अपने बच्चों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने से वंचित रह गए हैं.
एसोसिएशन ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां मामला अभी लंबित है. इसके अलावा, राज्य सरकार ने प्रति बच्चा मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि को बढ़ाने की निजी स्कूलों की मांग को भी साफ खारिज कर दिया है.