छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बर्खास्त कांस्टेबल की याचिका की खारिज
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा बल के जवानों द्वारा अनुशासन का उल्लंघन, विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में, बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने बस्तर जिले में तैनात एक कांस्टेबल की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपनी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करने और पिछले वेतन सहित सेवा में बहाली की मांग की थी.
अदालत ने कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि एक अनुशासित पुलिस बल का सदस्य होने के नाते, बिना किसी पूर्व सूचना या स्वीकृति के ड्यूटी से गायब रहना न केवल लापरवाही है, बल्कि यह विभाग की परिचालन तैयारियों और संस्थागत अखंडता को भी कमजोर करता है.
यह मामला बस्तर जिले के पुलिस कैंप झरामगांव का है, जहां तैनात याचिकाकर्ता कांस्टेबल 13 जून 2018 से 12 जनवरी 2019 तक, यानी कुल 213 दिनों तक लगातार ड्यूटी से अनुपस्थित रहा था.
याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि उसकी यह अनुपस्थिति जानबूझकर नहीं थी, बल्कि उसे गोद लेने वाले चाचा की मृत्यु, पत्नी की गर्भावस्था और स्वयं के खराब स्वास्थ्य जैसी व्यक्तिगत कठिनाइयों के कारण उसे घर रुकना पड़ा.
हालांकि, राज्य सरकार की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने इन तर्कों का खंडन करते हुए बताया कि याचिकाकर्ता एक 'आदतन अपराधी' रहा है, जिसे पूर्व में भी इसी तरह के कदाचार के लिए पांच छोटी और दो बड़ी सजाएं दी जा चुकी थीं.
अदालत ने विभागीय जांच की समीक्षा करते हुए पाया कि पुलिस अधीक्षक बस्तर द्वारा जारी बर्खास्तगी का आदेश पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत था.
न्यायमूर्ति प्रसाद ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी करने से लेकर गवाहों से जिरह करने तक के पर्याप्त अवसर दिए गए थे, लेकिन उसने इनका लाभ नहीं उठाया.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'श्याम लाल बनाम उत्तर प्रदेश' मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सहानुभूति के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता.
उच्च न्यायालय ने अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि नक्सल प्रभावित जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में लंबी अनुपस्थिति एक गंभीर सेवा उल्लंघन है, जिसके लिए विभाग द्वारा दी गई सेवा समाप्ति की सजा बिल्कुल उचित है.