छत्तीसगढ़ HC का फैसला: अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण का हक
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पारिवारिक अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें एक पति को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 12,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था. चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की पीठ ने पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए साफ किया कि पत्नी की कमाई की क्षमता के आरोपों को तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके पक्ष में ठोस सबूत न पेश किए जाएं.
मामला एक अंतरधार्मिक विवाह से जुड़ा है. कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, जैन समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पति और ईसाई समुदाय की पत्नी लवली सागर की मुलाकात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर हुई थी.
धीरे-धीरे यह दोस्ती प्यार में बदली और अक्टूबर 2020 में दोनों परिवारों की सहमति से 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत दोनों का विवाह संपन्न हुआ. पति बेंगलुरु में बतौर इंजीनियर कार्यरत है और उसकी मासिक आय लगभग 84,000 रुपये है.
शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के रिश्तों में खटास आ गई. पत्नी का आरोप था कि शादी से पहले बेंगलुरु में अलग रहने का वादा किया गया था, लेकिन बाद में उस पर और उसके परिवार पर जैन धार्मिक रीति-रिवाजों को अपनाने का दबाव बनाया जाने लगा.
इसके चलते दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया और पति ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी. इसी बीच, पत्नी ने भरण-पोषण के लिए पारिवारिक अदालत का रुख किया.
पति ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि उसकी पत्नी शिक्षित है और शादी से पहले एक निजी कंपनी में काम कर चुकी है, इसलिए वह अपना खर्च उठाने में सक्षम है. साथ ही उसने दावा किया कि पत्नी बिना किसी ठोस वजह के उससे अलग रह रही है.
हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि पति अपने इन दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका.
इसके अलावा, पति द्वारा पेन ड्राइव के जरिए पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को भी अदालत ने खारिज कर दिया, क्योंकि वे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के मानकों के अनुरूप साबित नहीं किए जा सके थे. अदालत ने माना कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है और वह वैध कारणों से अलग रह रही है, इसलिए वह इस भत्ते की हकदार है.