छत्तीसगढ़ के जंगल: राज्य की इकोनॉमी में 11% से ज्यादा का योगदान
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के समृद्ध जंगल सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि राज्य की आर्थिक रीढ़ भी हैं. ‘द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट’ (TERI) के एक हालिया अध्ययन से खुलासा हुआ है कि 'इकोसिस्टम सर्विसेज' (पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं) को शामिल करने पर राज्य की अर्थव्यवस्था में वनों का कुल योगदान 11.4 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जो सालाना लगभग 1.41 लाख करोड़ रुपये बैठता है.
यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि पारंपरिक मूल्यांकन पद्धतियों में केवल लकड़ी और लॉगिंग को ही गिना जाता था, जिससे यह योगदान महज 3.46 प्रतिशत दिखाई देता था. नए अध्ययन ने साबित कर दिया है कि वनों का असली आर्थिक मूल्य उनके केवल दोहन में नहीं, बल्कि उनके संरक्षण में है.
लगभग 44 प्रतिशत वन क्षेत्र से घिरे छत्तीसगढ़ में करीब 1.27 करोड़ लोग जंगलों के आसपास रहते हैं. इनमें एक बड़ी आबादी आदिवासी समुदायों की है, जिनकी आजीविका पूरी तरह से वनों पर निर्भर है.
टेरी की रिपोर्ट के मुताबिक, जंगल न केवल बांस, जलाऊ लकड़ी और लघु वनोपज जैसे प्रत्यक्ष संसाधन देते हैं, बल्कि पर्यावरण को संतुलित रखने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं.
आंकड़ों के अनुसार, कार्बन सोखने (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन), जल संरक्षण, मिट्टी की सुरक्षा और परागण जैसी नियामक सेवाएं हर साल 48,908 करोड़ रुपये का योगदान देती हैं, जबकि जैव विविधता संरक्षण से सालाना 56,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मूल्य मिलता है.
इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को वन संरक्षण के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बताया गया है. राज्य ने डिजिटल वन निगरानी, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने, जलवायु-अनुकूल वानिकी और वनों पर निर्भर समुदायों के लिए सतत आजीविका कार्यक्रमों में बेहतरीन काम किया है.
वन विभाग का मानना है कि विकास योजनाओं में वनों के इस वास्तविक मूल्य को शामिल करने से पर्यावरण और प्रगति के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा. साथ ही, कार्बन फाइनेंस और ग्रीन इकोनॉमी जैसे माध्यमों से भविष्य में वन संरक्षण के लिए और अधिक संसाधन जुटाए जा सकते हैं.