छत्तीसगढ़ के दुर्ग में अफ्रीकन स्वाइन फीवर से सैकड़ों सूअरों की मौत
दुर्ग । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में अफ्रीकन स्वाइन फीवर के खतरनाक प्रकोप ने पशुपालन क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया है. जिले के मुडपार-नारधा स्थित एक बड़े सूअर पालन केंद्र में संक्रमण फैलने से अब तक 300 से अधिक सूअरों की जान जा चुकी है.
यह फार्म स्थानीय बाजारों के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों में भी मांस आपूर्ति का एक मुख्य स्रोत था, जिसके चलते इस बीमारी के फैलने से करोड़ों रुपये के आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है.
घटना की गंभीरता को देखते हुए पशुपालन विभाग ने त्वरित कार्रवाई की है.
विभाग के डिप्टी डायरेक्टर वसीम शम्स ने पुष्टि की है कि भोपाल स्थित हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज लैब को भेजे गए नमूनों में अफ्रीकन स्वाइन फीवर की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है.
इसके तुरंत बाद, संक्रमण को रोकने के लिए प्रशासन ने कड़े कदम उठाते हुए 6 अप्रैल को फार्म के 80 से अधिक संक्रमित सूअरों को प्रोटोकॉल के तहत इंजेक्शन देकर मार दिया और उन्हें सुरक्षित तरीके से दफनाया गया.
फार्म मालिक के अनुसार, मौत का यह सिलसिला 1 अप्रैल से तेजी से शुरू हुआ था. देखते ही देखते सैकड़ों जानवरों ने दम तोड़ दिया, जिससे पूरा फार्म सील कर दिया गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस केवल सूअरों को ही संक्रमित करता है और इससे इंसानों या अन्य मवेशियों को कोई खतरा नहीं है.
हालांकि, इस बीमारी का कोई इलाज या टीका उपलब्ध न होने के कारण संक्रमित पशुओं को नष्ट करना ही एकमात्र विकल्प बचता है. फिलहाल, विभाग की टीमें प्रभावित क्षेत्र में निगरानी रख रही हैं ताकि संक्रमण को दूसरे फार्मों तक फैलने से रोका जा सके.
गौरतलब है कि अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) एक अत्यंत संक्रामक और घातक रक्तस्रावी वायरल बीमारी है जो घरेलू और जंगली सूअरों को प्रभावित करती है. यह किसी बैक्टीरिया से नहीं, बल्कि 'एस्फ़ाविर्डा' (Asfarviridae) परिवार के 'एस्फ़ावायरस' (Asfivirus) नाम के डीएनए वायरस के कारण होता है.
इस बीमारी की सबसे राहत भरी बात यह है कि यह "ज़ूनोटिक" नहीं है, जिसका अर्थ है कि यह संक्रमित सूअरों से इंसानों में नहीं फैलती और न ही इंसानों के स्वास्थ्य के लिए कोई सीधा खतरा पैदा करती है.
हालांकि, इंसानों के माध्यम से यह वायरस कपड़ों, जूतों या उपकरणों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक अनजाने में पहुंच सकता है.
भारत में इस बीमारी की उपस्थिति समय-समय पर विभिन्न राज्यों में दर्ज की गई है, जिनमें मुख्य रूप से असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम, बिहार, केरल, पंजाब और हाल ही में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
पूर्वोत्तर भारत के राज्य भौगोलिक सीमाओं और सूअर पालन की अधिकता के कारण इसके प्रति अधिक संवेदनशील रहे हैं.
वर्तमान में अफ्रीकन स्वाइन फीवर का दुनिया भर में कोई स्वीकृत इलाज, दवा या प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध नहीं है.
चूँकि इसमें मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है, इसलिए संक्रमण को रोकने का एकमात्र तरीका प्रभावित क्षेत्र के सूअरों को मारना उन्हें सुरक्षित रूप से दफनाना और पूरे फार्म को सैनिटाइज करना ही है. बचाव के लिए सख्त बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाना ही पशुपालकों के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है.
इस बीमारी का सबसे पहला मामला 1921 में पूर्वी अफ्रीका के केन्या में दर्ज किया गया था, जहाँ जंगली सूअरों से यह वायरस घरेलू सूअरों में फैला था. चूँकि इसकी पहचान सबसे पहले अफ्रीकी महाद्वीप में हुई, इसलिए इसके नाम में 'अफ्रीकन' शब्द जुड़ गया.
चूंकि यह विशेष वायरस केवल सूअर प्रजाति के जानवरों को ही संक्रमित करता है और उनमें तेज बुखार के साथ आंतरिक रक्तस्राव पैदा करता है, इसलिए इसे सामूहिक रूप से 'अफ्रीकन स्वाइन फीवर' नाम दिया गया.
यह नाम इसे 'क्लासिकल स्वाइन फीवर' से अलग करने के लिए भी जरूरी है, जो एक अलग वायरस के कारण होता है. सरल शब्दों में कहें तो, अफ्रीका से शुरू हुई सूअरों की जानलेवा बुखार वाली बीमारी होने के कारण ही इसे यह नाम मिला है.