CEC ने भारत के विरोधी दलों को एकजुट किया
नई दिल्ली । डेस्क: भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यों ने देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक अभूतपूर्व तूफान खड़ा कर दिया है. उन पर गंभीर आरोप लग रहे हैं कि वे निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को ताक पर रखकर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में कार्य कर रहे हैं. हालांकि, इस विवाद ने एक अप्रत्याशित परिणाम सामने लाया है-विपक्षी दलों का अभूतपूर्व एकीकरण, जिसने बीजेपी की सियासी रणनीति को गहरी चोट पहुंचाई है.
बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का विवाद
लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों को लेकर विपक्षी दल लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं. उनकी शिकायत थी कि मतगणना और नतीजों में पारदर्शिता की कमी थी. अब बिहार में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) ने इस आक्रोश को और हवा दी है. विपक्षी दलों ने इसे "वोट चोरी" की सुनियोजित प्रक्रिया करार दिया है. उनका दावा है कि इस अभियान के जरिए मतदाता सूची से उन लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं, जो बीजेपी के पक्ष में वोट देने की संभावना कम रखते हैं.
इस मुद्दे ने इंडिया गठबंधन को फिर से सक्रिय कर दिया है. गठबंधन के नेता सड़कों पर उतर आए हैं और देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं. खास बात यह है कि आम आदमी पार्टी (आप), जो कुछ समय पहले इंडिया गठबंधन से दूरी बना चुकी थी, भी इस मुद्दे पर फिर से साथ आ गई है. आप के नेता अरविंद केजरीवाल ने इस अभियान को "लोकतंत्र पर हमला" करार देते हुए कहा कि यह भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की साजिश है.
इम्पीचमेंट की मांग और सियासी हलचल
विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उनके इम्पीचमेंट की मांग उठाई है. संसद के अंदर और बाहर इस मांग ने जोर पकड़ लिया है. विपक्ष का कहना है कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का निष्पक्षता खोना देश के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बयान में कहा, "अगर निर्वाचन आयोग ही पक्षपातपूर्ण हो जाए, तो जनता का भरोसा लोकतंत्र से उठ जाएगा. यह देश के लिए खतरनाक है."
विपक्षी दलों ने संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की योजना बनाई है. कुछ नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की बात भी कही है, जिसमें वे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली की जांच की मांग करेंगे.
पूर्व उपराष्ट्रपति का रहस्यमयी इस्तीफा
इस बीच, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे ने भी सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है. संसद के मॉनसून सत्र के बीच उनका इस्तीफा और उसके बाद उनकी गायब सी स्थिति ने कई सवाल खड़े किए हैं. विपक्ष का दावा है कि यह घटना संवैधानिक संस्थाओं को अस्थिर करने की बीजेपी की रणनीति का हिस्सा है. कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे "सत्ता का दुरुपयोग" करार देते हुए कहा कि बीजेपी उन सभी संस्थाओं को अपने नियंत्रण में लेना चाहती है, जो लोकतंत्र के रक्षक हैं.
नियुक्ति प्रक्रिया पर गहराता विवाद
ज्ञानेश कुमार और उनके पूर्ववर्ती राजीव कुमार की नियुक्ति प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है. विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अपने करीबी लोगों को निर्वाचन आयोग में नियुक्त किया है. 2023 में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव ने इस विवाद को और गहरा दिया. इस बदलाव के तहत, मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति समिति से हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया. विपक्ष इसे संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता पर हमला मानता है.
लोकतंत्र पर मंडराता संकट
आलोचकों का कहना है कि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल भारत के लोकतंत्र में गहरे संकट का संकेत दे रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह स्थिति बनी रही, तो जनता का भरोसा न केवल निर्वाचन आयोग से, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे से उठ सकता है.
हालांकि, इस संकट ने विपक्षी दलों को एक नई ताकत दी है. जहां बीजेपी विपक्षी गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश में थी, वहीं ज्ञानेश कुमार का विवादास्पद कार्यकाल अनजाने में विपक्ष की एकता का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है. विपक्षी नेता अब इस मुद्दे को जनता के बीच ले जा रहे हैं और इसे 2025 के आगामी विधानसभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनाने की योजना बना रहे हैं.