बंगाल: अब सरकार जमीन खरीदकर निजी कंपनियों को सौंपेगी
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित भाजपा सरकार ने राज्य में औद्योगीकरण को रफ्तार देने के लिए अपनी नीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शनिवार को एलान किया कि अब राज्य सरकार सीधे जमीन की "खरीद" करेगी और उसे औद्योगिक परियोजनाओं के लिए निजी कंपनियों को सौंपेगी. यह फैसला पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार की उस नीति के ठीक उलट है, जिसमें सरकार जमीन अधिग्रहण के मामलों से पूरी तरह दूरी बनाकर रखती थी.
डनकुनी में होजरी क्षेत्र की जानी-मानी कंपनी 'लक्स कोजी ग्रुप' की नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का शिलान्यास करने के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने यह घोषणा की. उन्होंने बताया कि सरकार ने साल 2013 की प्रत्यक्ष भूमि खरीद नीति को स्वीकार कर लिया है. इसी नीति के तहत फिलहाल बीएसएफ, रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और नए एयरपोर्ट के लिए जमीन दी जा रही है.
उन्होंने उद्योगपतियों को भरोसा देते हुए कहा कि इस भूमि खरीद योजना के तहत सरकार खुद जमीन खरीदेगी और सीधे उद्योग जगत को सौंपेगी.
मुख्यमंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि उनकी सरकार राज्य में सिंगूर और नंदीग्राम जैसे हिंसक आंदोलनों की पुनरावृत्ति बिल्कुल नहीं चाहती, जिसने कभी वामपंथ के 34 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका था और बंगाल में औद्योगिक विकास की उम्मीदों को करारा झटका दिया था.
दिलचस्प बात यह है कि सुवेंदु अधिकारी खुद तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख नेता के रूप में इन्हीं आंदोलनों के जरिए राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे थे. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार नहीं चाहती कि उद्योगपतियों द्वारा सीधे जमीन खरीदने की वजह से राज्य में एक और नंदीग्राम या सिंगूर जैसा विवाद खड़ा हो.
इस घोषणा के बाद व्यापार जगत में इस बात को लेकर संशय भी देखा गया कि क्या सरकार निजी कंपनियों द्वारा सीधे जमीन खरीदने पर रोक लगाएगी? हालांकि, एक बिजनेस चैंबर के अधिकारी के अनुसार, शुरुआती समझ यही है कि सरकार निजी तौर पर जमीन खरीदने से रोकेगी नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त और आसान जरिया दे रही है. इस नीति की आधिकारिक घोषणा दुर्गा पूजा से पहले होने की उम्मीद है.
दरअसल, ममता बनर्जी सरकार भूमि अधिग्रहण के राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए जमीन खरीदने का काम पूरी तरह निजी कंपनियों पर छोड़ देती थी. लेकिन इसमें पेंच यह था कि जैसे ही कंपनियां तय सीमा से अधिक जमीन खरीदती थीं, उन्हें एक बेहद जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, जिसके तहत जमीन पहले सरकारी नियंत्रण में आती थी और फिर उसे लीज पर दिया जाता था.
साथ ही, बंगाल में छोटे और खंडित भूखंडों के कारण बड़ी कंपनियों के लिए एकमुश्त बड़ी जमीन जुटाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है.
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि ममता सरकार की प्रत्यक्ष भूमि खरीद नीति इसलिए भी नाकाम रही क्योंकि उसमें जमीन मालिकों को बाजार दर का केवल डेढ़ (1.5) गुना मुआवजा मिलता था, जिससे किसानों ने जमीन देने से इनकार कर दिया.
इसके विपरीत, यदि मौजूदा सरकार 2013 के केंद्रीय भूमि अधिग्रहण अधिनियम को पूरी तरह लागू करती है, तो किसानों को बाजार मूल्य से चार गुना अधिक मुआवजा और संपत्तियों का उचित दाम मिल सकेगा.
हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि इस नीति को लागू करने के लिए सरकार को नियमों का ड्राफ्ट तैयार कर जनता से राय मांगनी होगी और कैबिनेट की मंजूरी के बाद गजट नोटिफिकेशन जारी करना होगा. साथ ही, कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए सरकार को यह साबित करना होगा कि यह अधिग्रहण 'सार्वजनिक हित' (Public Purpose) जैसे कि रोजगार सृजन या बुनियादी ढांचे के विकास के लिए किया जा रहा है.
इसके अलावा, सरकार राजस्थान और हरियाणा की तर्ज पर 'लैंड पूलिंग' (भूमि एकत्रीकरण) के विकल्प पर भी विचार कर रही है, जहां किसान स्वेच्छा से अपनी जमीन विकास कार्यों के लिए देते हैं और बदले में उन्हें विकसित जमीन का हिस्सा व सालाना वित्तीय सहायता मिलती है.