बस्तर: बंदूक छोड़ अब विकास से जुड़ रहे आत्मसमर्पित नक्सली
बस्तर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में हिंसा और संघर्ष का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले पूर्व माओवादियों के जीवन में अब बड़ा बदलाव आ रहा है. राज्य सरकार की प्रभावी पुनर्वास नीति और 'कौशल विकास' पहलों के माध्यम से सैकड़ों आत्मसमर्पित कैडर आज समाज के जिम्मेदार नागरिक बनकर उभर रहे हैं.
राज्य के सभी सात नक्सल प्रभावित जिलों में यह पुनर्वास कार्यक्रम तेजी से चल रहा है, जिसका उद्देश्य इन युवाओं को केवल नीतिगत सहायता ही नहीं, बल्कि सम्मान और सहानुभूति के साथ नया जीवन देना है.
बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. ने बताया कि जिला पुनर्वास केंद्रों में पेशेवर प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कई पूर्व माओवादी आज अपने जीवन की नई शुरुआत कर रहे हैं.
यह परिवर्तन केवल क्षेत्र पर नियंत्रण पाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भटके हुए युवाओं के जीवन को वापस सही दिशा में लाने की एक बड़ी सफलता है. पुनर्वास की प्रक्रिया 'पुनर्वास केंद्रों' से शुरू होती है, जहाँ 15 दिनों के ओरिएंटेशन प्रोग्राम के माध्यम से उन्हें स्वास्थ्य जांच और बुनियादी सामाजिक तालमेल सिखाया जाता है.
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के अनुसार, राज्य सरकार का मुख्य लक्ष्य इन युवाओं को कौशल, रोजगार और सम्मान देकर मुख्यधारा से जोड़ना है. इसके लिए जगदलपुर जैसे क्षेत्रों में 'लाइवलीहुड कॉलेज' मील का पत्थर साबित हो रहे हैं.
अब तक 1,250 से अधिक पूर्व कैडर अपना प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं, जबकि सैकड़ों अन्य अलग-अलग ट्रेड में ट्रेनिंग ले रहे हैं.
दिलचस्प बात यह है कि जो हाथ कभी हथियार थामते थे, वे अब स्टीयरिंग व्हील, सिलाई मशीन और लकड़ी नक्काशी के औजार चलाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं.
इसी कड़ी में जगदलपुर का 'पांडुम कैफे' एक अनूठी मिसाल बनकर उभरा है, जहाँ पूर्व कैडर और नक्सल हिंसा के पीड़ित मिलकर सम्मानजनक आजीविका कमा रहे हैं. जिला प्रशासन इन लाभार्थियों को टूलकिट और मशीनें भी उपलब्ध करा रहा है ताकि शांति का रास्ता चुनने वाला हर व्यक्ति आर्थिक रूप से सशक्त हो सके.