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बांग्लादेश में जनता ने कट्टरपंथियों को नकारा- तस्लीमा नसरीन

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08 मार्च 2026, 07:55 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

 तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन

नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन ने बांग्लादेश के हालिया चुनाव परिणामों पर अपनी बेबाक राय रखते हुए कहा है कि फरवरी 2026 के चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को मिली प्रचंड जीत असल में कट्टरपंथियों को सत्ता से बाहर रखने का जनता का एक ठोस फैसला है. उन्होंने पीटीआई वीडियो से बातचीत में स्पष्ट किया कि बीएनपी की 209 सीटों पर जीत पार्टी की लोकप्रियता से कहीं ज्यादा 'पाकिस्तान समर्थित' जमात-ए-इस्लामी को रोकने का परिणाम है. 


नसरीन के अनुसार, अवामी लीग की अनुपस्थिति में जनता के पास बीएनपी ही एकमात्र व्यवहार्य विकल्प था. उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में अब हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमले रुकेंगे, जो मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान काफी बढ़ गए थे.


इसी दौरान तस्लीमा नसरीन ने भारत और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति की तुलना करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम आबादी न केवल सुरक्षित है, बल्कि बढ़ रही है और उन्हें हिंदुओं के समान ही सभी कानूनी और नागरिक अधिकार प्राप्त हैं, जबकि इसके विपरीत बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या लगातार घट रही है. 


उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पिछली वामपंथी सरकार की भी आलोचना की, जिन्होंने उन्हें कोलकाता लौटने की अनुमति नहीं दी. 


इसके अलावा, नसरीन ने ईरान में 'मुल्ला-शाही' और महिलाओं पर थोपे गए हिजाब का विरोध तो किया, लेकिन साथ ही ईरान पर अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई की कड़ी निंदा की, जिसमें स्कूली बच्चों सहित सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की जान गई है.


गौरतलब है कि तस्लीमा नसरीन बांग्लादेश की एक विख्यात लेखिका, नारीवादी कार्यकर्ता और पूर्व चिकित्सक हैं, जो अपने साहसी और बेबाक लेखन के लिए जानी जाती हैं. उन्होंने 1980 के दशक के अंत में एक कवयित्री के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की, लेकिन उनके उपन्यास 'लज्जा' (1993) ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई. 


इस उपन्यास में बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों का चित्रण किया गया था, जिसके कारण कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया. भारी विरोध और धमकियों के चलते उन्हें 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और तब से वे निर्वासन में रह रही हैं.


तस्लीमा नसरीन ने अपने जीवन के कई साल स्वीडन, जर्मनी और अमेरिका में बिताए, लेकिन वे लंबे समय से भारत (विशेषकर नई दिल्ली) में रह रही हैं. वे इस्लाम और अन्य धर्मों में महिलाओं के प्रति भेदभाव और कट्टरपंथ की प्रखर आलोचक रही हैं. 


उनके लेखन के कारण उन्हें 'आनंद पुरस्कार' और यूरोपीय संसद के 'सखारोव पुरस्कार' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं. वर्तमान में, वे लगातार मानवाधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में अपनी आवाज उठाती रहती हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP