बांग्लादेश चुनाव: युवाओं से नौकरी, परिवार कार्ड और कर राहत का वादा
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले चुनावी माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है. सत्ता से बेदखल पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद मुकाबला मुख्य रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाले गठबंधन और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले मोर्चे के बीच सिमट गया है. दोनों ही खेमे बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बड़े-बड़े वादों के साथ मैदान में हैं, लेकिन अर्थशास्त्रियों और मतदाताओं के मन में सवाल है, क्या ये वादे ज़मीनी हकीकत में पूरे हो पाएंगे?
युवाओं की बेचैनी और ‘मेरिट’ की मांग
27 वर्षीय मोहाइमिनुल रफी जैसे लाखों युवा इस चुनाव के केंद्र में हैं. वर्षों से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे रफी मानते हैं कि सरकारी नौकरी आज भी “सुरक्षित जीवन का सबसे भरोसेमंद रास्ता” है. 2024 में नौकरी आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन में रफी भी शामिल थे, जो बाद में एक बड़े जनउभार में बदल गया और हसीना सरकार के पतन का कारण बना.
रफी का कहना है कि बेरोजगार युवाओं को नकद सहायता या ब्याजमुक्त कर्ज मददगार हो सकता है, लेकिन असली जरूरत “स्वस्थ जॉब मार्केट और योग्यता के आधार पर भर्ती” की है. उनके शब्दों में, “नौकरी और सामाजिक सुरक्षा ऐसे वादे बन गए हैं, जैसे कोई स्विच दबाते ही सब हो जाएगा.”
सुस्त अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि
चुनावी वादे ऐसे समय में सामने आ रहे हैं, जब बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति दबाव में है. महामारी से पहले 2019 में 8 प्रतिशत से अधिक की विकास दर अब घटकर 4–5 प्रतिशत पर आ गई है. महंगाई लंबे समय से ऊंचे एकल अंक में बनी हुई है, जिससे आम लोगों की क्रयशक्ति कमजोर हुई है. निजी निवेश GDP के लगभग 22–23 प्रतिशत पर अटका है और टैक्स-टू-GDP अनुपात 7 प्रतिशत से भी कम है, जबकि विशेषज्ञ इसे कम से कम 15 प्रतिशत मानते हैं.
अर्थशास्त्री हुसैन जिलुर रहमान के अनुसार, नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने कुछ हद तक मैक्रो-स्थिरता जरूर लाई, लेकिन घरेलू स्तर पर आर्थिक संकट, रोजगार और निवेश को लेकर वह अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा पाई.
‘फैमिली कार्ड’ बनाम ‘स्मार्ट सोशल सिक्योरिटी कार्ड’
BNP का प्रमुख चुनावी वादा “फैमिली कार्ड” है, जिसके तहत चार मिलियन परिवारों को हर महीने 2,000 से 2,500 टका नकद या जरूरी वस्तुओं का पैकेट देने की योजना है. अगर यह योजना पूरे देश में लागू होती है, तो इसका सालाना खर्च करीब 1.2 ट्रिलियन टका होगा, जो मौजूदा सामाजिक सुरक्षा बजट को लगभग दोगुना कर देगा.
वहीं जमात-ए-इस्लामी “स्मार्ट सोशल सिक्योरिटी कार्ड” का प्रस्ताव दे रही है, जिसे राष्ट्रीय पहचान पत्र, स्वास्थ्य सेवाओं, कर प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जाएगा. पार्टी का दावा है कि इससे लीकेज कम होगा और लाभ सही लोगों तक पहुंचेगा.
नीति विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौती केवल बजट बढ़ाने की नहीं, बल्कि पारदर्शिता और वितरण प्रणाली सुधारने की है.
नौकरी के वादे: आंकड़ों का खेल
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 में कॉलेज-शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर 13.5 प्रतिशत है, यानी करीब 8.85 लाख स्नातक बेरोजगार हैं. BNP ने 18 महीनों में 1 करोड़ नौकरियां पैदा करने और “योग्यता आधारित भर्ती” का वादा किया है. साथ ही डिजिटल इकोनॉमी में 8 लाख आईटी नौकरियों और पेपाल जैसे अंतरराष्ट्रीय पेमेंट गेटवे शुरू करने की बात कही है.
जमात का फोकस प्रशिक्षण पर है पांच साल में 1 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग, हर उप-जिले में ‘यूथ टेक लैब’, 50 लाख नौकरियों से जोड़ने के लिए ‘जॉब बैंक’ और 15 लाख फ्रीलांसर तैयार करने का लक्ष्य.
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, इन लक्ष्यों को पाने के लिए 8–10 प्रतिशत की सतत विकास दर और बड़े निवेश की जरूरत होगी.
शिक्षा, कर और उद्योग
BNP शिक्षा क्षेत्र में “वन टीचर, वन टैब” योजना, व्यावसायिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने और मिड-डे मील विस्तार का वादा कर रही है. जमात ने मेधावी छात्रों के लिए ब्याजमुक्त शिक्षा ऋण और विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए सीमित सहायता की घोषणा की है.
कर नीति पर जमात ने कॉरपोरेट टैक्स 19 प्रतिशत और वैट 10 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा है, जबकि BNP ने व्यापक “बिजनेस-फ्रेंडली सुधारों” की बात कही है. उद्योग के लिए जमात ने तीन साल तक यूटिलिटी टैरिफ फ्रीज करने का वादा किया है, जिसे कुछ अर्थशास्त्री व्यावहारिक मानते हैं.
जानकार मानते हैं कि चुनाव से अनिश्चितता खत्म हो सकती है और अर्थव्यवस्था को “रीस्टार्ट” का मौका मिल सकता है, लेकिन किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.
रफी जैसे युवाओं के लिए मुद्दा साफ है अगर व्यवसायों से वसूली और नौकरियों में रिश्वत की संस्कृति खत्म नहीं होती, तो नए वादे भी पुराने हालात में बदल जाएंगे. चुनावी मंचों से किए जा रहे बड़े ऐलान मतदाताओं को आकर्षित जरूर कर रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा 12 फरवरी के बाद शुरू होगी.