अमेरिका चांद पर हाइड्रोजन बम फोड़ना चाहता था !
नई दिल्ली । डेस्क: आज जब NASA और दुनिया की दूसरी स्पेस एजेंसियां चंद्रमा पर दोबारा इंसानों को भेजने की होड़ में हैं, तो एक पुरानी सच्चाई याद आती है जो साइंस फिक्शन से भी ज्यादा डरावनी लगती है. 1950 के दशक में अमेरिका ने सोवियत संघ को मात देने के लिए चंद्रमा पर हाइड्रोजन बम गिराने की गुप्त योजना बनाई थी.
यह प्रोजेक्ट A119 के नाम से जाना गया, जो अपोलो 11 के चंद्र लैंडिंग से कई साल पहले की बात है.
साल 1957 में जब सोवियत यूनियन ने स्पूतनिक-1 लॉन्च कर दुनिया को चौंका दिया, तो अमेरिका में हड़कंप मच गया. उन्हें लगा कि अगर रूस चंद्रमा पर पहले पहुंच गया, तो यह उनकी साख के लिए बड़ा झटका होगा.
इसलिए, अमेरिकी वायुसेना और वैज्ञानिक लियोनार्ड रेफील ने मिलकर 1958 से 1959 के बीच एक रिपोर्ट तैयार की. इसमें प्लान था कि चंद्रमा के 'टर्मिनेटर लाइन' पर जहां दिन और रात की सीमा होती है एक विशाल हाइड्रोजन बम फोड़ा जाए. यह धमाका इतना चमकीला होता कि धरती से नंगी आंखों से दिखाई देता, और दुनिया को संदेश जाता कि अमेरिका का दबदबा किसी से कम नहीं.
इस हमले का मकसद सिर्फ सोवियत स्पेस प्रोग्राम को तोड़ना नहीं था, बल्कि चंद्रमा पर अमेरिकी झंडा गाड़ने जैसा दावा ठोंकना भी. लेकिन खुशकिस्मती से यह प्लान आगे नहीं बढ़ा.
वायुसेना को डर था कि बम का असर धरती पर भी पड़ सकता है, जैसे रेडिएशन या अन्य खतरे. इतिहासकार एलेक्स वेलरस्टीन, जो न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं, कहते हैं, "प्रोजेक्ट A119 स्पूतनिक की प्रतिक्रिया में बने कई पागलपन भरे आइडियाज में से एक था. इसमें स्पूतनिक को गोली मारकर गिराने का प्लान भी शामिल था."
आखिरकार, 1969 में अमेरिका ने अपोलो 11 मिशन से चंद्रमा पर पहला कदम रखा. नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन के बाद कुल 12 अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर उतरे – पेट कोंराड, एलन बीन, एलन शेपर्ड, एडगर मिशेल, डेविड स्कॉट, जेम्स इर्विन, जॉन यंग, चार्ल्स ड्यूक, जीन सर्नान और हैरिसन श्मिट. यह मानव इतिहास का स्वर्णिम पल था, जो बताता है कि प्रतिस्पर्धा ने हमें युद्ध की बजाय खोज की राह दिखाई.
आज Artemis मिशन के दौर में, यह पुरानी साजिश हमें सोचने पर मजबूर करती है कि स्पेस रेस कितनी खतरनाक हो सकती थी. क्या इतिहास खुद को दोहराएगा, या हम शांति से तारों को छुएंगे? (Symbolic Photo)