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मध्यप्रदेश में गोमूत्र-गोबर से कैंसर इलाज शोध पर घोटाले के आरोप

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10 जन. 2026, 07:05 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

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भोपाल । डेस्क: मध्यप्रदेश में गोमूत्र, गोबर और गाय के दूध से कैंसर के इलाज की संभावनाओं पर शुरू हुई एक सरकारी शोध परियोजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है. इस शोध के नाम पर सरकारी अनुदान की राशि में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. मामले की जांच भी शुरू हो चुकी है और शुरुआती जांच रिपोर्ट में खर्च के कई मदों को संदिग्ध बताया गया है.


यह शोध वर्ष 2011 में शुरू हुआ था, जब मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे, जो वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं. यह शोध जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा था. शोध का उद्देश्य यह जानना था कि क्या गोबर, गोमूत्र या गाय के दूध के मिश्रण से तैयार किसी पदार्थ का उपयोग कैंसर के उपचार में किया जा सकता है.


विश्वविद्यालय ने इस शोध के लिए लगभग 8 करोड़ रुपये की मांग की थी, लेकिन राज्य सरकार ने 3.5 करोड़ रुपये के अनुदान को मंजूरी दी थी. अब आरोप है कि इस राशि का उपयोग शोध के वास्तविक उद्देश्य से हटकर किया गया और कई मदों में बाजार दर से कहीं अधिक खर्च दिखाया गया.


मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जिला प्रशासन को इस संबंध में एक शिकायत प्राप्त हुई थी. शिकायत मिलने के बाद संभागीय आयुक्त ने मामले की जांच के निर्देश दिए. इसके बाद जबलपुर के कलेक्टर ने अतिरिक्त कलेक्टर के नेतृत्व में एक जांच समिति गठित की. 


समिति ने 2011 से 2018 के बीच हुए खर्चों की विस्तृत जांच की और हाल ही में अपनी रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी है. हालांकि रिपोर्ट को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि इसमें कई गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा किया गया है.


जांच में सामने आया है कि गोबर, गोमूत्र, इनके भंडारण के बर्तन, कच्चा माल और कुछ उपकरणों जैसी सामान्य वस्तुओं की खरीद पर लगभग 1 करोड़ 92 लाख रुपये खर्च किए गए. जांच अधिकारियों का मानना है कि उस समय के बाजार भाव के अनुसार इन वस्तुओं पर 15 से 20 लाख रुपये से अधिक खर्च नहीं होना चाहिए था. इसके अलावा, शोध के नाम पर 23 से 24 बार हवाई यात्राएं भी की गईं, जिनकी आवश्यकता और औचित्य पर भी सवाल उठाए गए हैं.


रिपोर्ट में लगभग साढ़े सात लाख रुपये की कीमत की एक कार खरीदे जाने का भी उल्लेख है, जो कथित तौर पर स्वीकृत बजट का हिस्सा नहीं थी. इसके साथ ही, दस्तावेजों में किसानों को प्रशिक्षण देने का दावा किया गया था, लेकिन किस प्रकार का प्रशिक्षण दिया गया, इसका कोई ठोस विवरण रिकॉर्ड में नहीं मिला.


जबलपुर के अतिरिक्त कलेक्टर रघुवर मारावी ने बताया कि कलेक्टर के निर्देश पर जांच कराई गई है. उन्होंने कहा कि कई ऐसी खरीदारी सामने आई हैं जो मूल रूप से स्वीकृत बजट में शामिल नहीं थीं. जांच रिपोर्ट में इन सभी बिंदुओं को दर्ज किया गया है.


वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी आरोपों को खारिज किया है. विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एस.एस. तोमर का कहना है कि 2012 से शोध पूरी पारदर्शिता और सरकारी नियमों के तहत किया गया है. 


उनके अनुसार, मशीनों या वाहनों की खरीद निविदा प्रक्रिया के माध्यम से की गई और किसी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं हुआ. उन्होंने यह भी दावा किया कि जांच समिति को सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं और कोई जानकारी छिपाई नहीं गई.


फिलहाल, प्रशासनिक स्तर पर जांच रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है. रिपोर्ट के सार्वजनिक होने और आगे की कार्रवाई पर अब सबकी नजरें टिकी हुई हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP