मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के बीच छिड़ा 'AI टोकन' का महायुद्ध
नई दिल्ली । डेस्क: मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग द्वारा एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों डॉलर खर्च करने के फैसले ने पूरी दुनिया को चौंकाया था, लेकिन अब इस महंगे दांव से कमाई का एक ठोस जरिया सामने आ गया है. मेटा अपनी अतिरिक्त एआई क्षमता को कॉर्पोरेट ग्राहकों को किराए पर देने के लिए 'मेटा कंप्यूट' नाम से एक आंतरिक परियोजना पर काम कर रहा है.
हालांकि वैश्विक स्तर पर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और एमेज़ॉन के प्रभुत्व को चुनौती देना आसान नहीं होगा, लेकिन इस कदम से भारतीय कॉर्पोरेट जगत में एक बड़ा भूचाल आने वाला है.
जुकरबर्ग की क्लाउड गेम में एंट्री एशिया के दो सबसे अमीर उद्योगपतियों, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की एआई प्रतिद्वंद्विता को एक नया मोड़ देने जा रही है.
अब तक डेटा सेंटर और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की दौड़ में गौतम अडानी आगे निकलते दिख रहे थे, जिन्होंने गूगल जैसी दिग्गज कंपनी के साथ साझेदारी कर देश में बड़े पैमाने पर सर्वर फार्म बनाए हैं. बंदरगाह, हवाई अड्डे और पावर ग्रिड संभालने वाले अडानी के लिए डेटा सेंटर का निर्माण एक स्वाभाविक विस्तार था.
लेकिन उनके ये इरादे अब मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज की महत्वाकांक्षाओं से टकरा रहे हैं. अंबानी अपनी टेलीकॉम और मीडिया इकाई 'जियो प्लेटफॉर्म्स' को एक मजबूत तकनीकी पहचान के साथ सार्वजनिक बाजार में उतारना चाहते हैं, जिसमें मेटा की पहले से ही लगभग 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी है.
खास बात यह है कि दोनों ही दिग्गजों के पास सॉफ्टवेयर आउटसोर्सिंग का कोई पुराना आधार नहीं है, जो आज के समय में उनके लिए वरदान साबित हो रहा है. जेनरेटिव एआई के आने से भारत के पारंपरिक सॉफ्टवेयर निर्यात के समीकरण बदल चुके हैं.
अब कम लागत पर काम करने वाले अंग्रेजी बोलने वाले इंजीनियरों की तुलना में सौर और पवन ऊर्जा के दम पर सस्ते 'एआई टोकन' बनाने वाले पूंजीपतियों का पलड़ा भारी है. इसी वजह से गुजरात का तटीय क्षेत्र अब टोकन फैक्ट्रियों के लिए बिजली पैदा करने का मुख्य केंद्र बन गया है, जहां अडानी और अंबानी दोनों ही दुनिया के सबसे बड़े सौर और नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर रहे हैं.
इस बीच, अंबानी और मेटा के बीच गुजरात के जामनगर में 168 मेगावाट का डेटा सेंटर स्थापित करने की साझेदारी ने खेल का रुख बदल दिया है. भारतीय कंपनियों के लिए इस रिलायंस-मेटा गठबंधन का सबसे बड़ा आकर्षण 'डेटा संप्रभुता' है.
बैंकिंग, बीमा, टेलीकॉम और रक्षा जैसे कड़े नियमों वाले क्षेत्रों के लिए अमेरिकी क्लाउड सर्वर पर संवेदनशील डेटा भेजना हमेशा से कानूनी पेचीदगियों भरा रहा है. लेकिन रिलायंस एंटरप्राइज इंटेलिजेंस (जिसमें रिलायंस की 70% और मेटा की 30% हिस्सेदारी है) के जरिए भारतीय बैंक या कंपनियां अपने देश की सीमा के भीतर ही एआई मॉडल को प्रशिक्षित और संचालित कर सकेंगी.
इसके अलावा, मेटा भारत में वॉट्सऐप के जरिए डिजिटल कॉमर्स और 'म्यूज स्पार्क' जैसे अपने प्रोप्रायटरी एआई इंजन के दम पर स्थानीय स्टोरफ्रंट्स को बदलने की तैयारी में है. दोनों ही भारतीय समूह खुद के बुनियादी एआई मॉडल बनाने के बजाय उनके लिए सबसे सस्ते और मजबूत लॉन्चपैड तैयार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.