अफ्रीका में Gen Z की आग: युवाओं का गुस्सा बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ
नई दिल्ली । डेस्क: अफ्रीका की धरती पर युवा तूफान तेज हो रहा है. केन्या से मेडागास्कर और अब मोरक्को तक, जेन जेड की पीढ़ी सड़कों पर उतर आई है. बेरोजगारी की मार, भ्रष्टाचार की जड़ें और सरकारों की लापरवाही ने इन युवाओं को एकजुट कर दिया है. सोशल मीडिया की ताकत से ये प्रदर्शन बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व के फूट रहे हैं, जो दुनिया भर के नेताओं के लिए चेतावनी की घंटी बजा रहे हैं.
महाद्वीप की सबसे युवा आबादी वाले इस क्षेत्र में, जहां औसत उम्र महज 19 साल है, लाखों नौजवान रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में छटपटा रहे हैं. केन्या में पिछले साल शुरू हुए आंदोलन ने आग लगाई, जहां राष्ट्रपति विलियम रुटो की वित्तीय नीतियों के खिलाफ सड़कें गूंजीं. महंगाई, कर्ज का बोझ और युवाओं के लिए नाकाफी नौकरियां – ये सब मुद्दे थे.
नैरोबी की सड़कों पर लाखों युवा उतरे, संसद भवन पर हमला बोला गया, और सुरक्षाबलों की गोलीबारी में सैकड़ों की जानें गईं.
मेडागास्कर में हालात और बिगड़ गए. बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से तंग युवाओं ने राष्ट्रपति एंड्री राजोएलिना के खिलाफ विद्रोह कर दिया. प्रदर्शनों की चपेट में आकर सरकार को भंग करना पड़ा, लेकिन गुस्सा शांत न हुआ. आखिरकार कूप हो गया, और अब कर्नल माइकल रैंड्रियनिरिना को नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई जाएगी. दो विश्वसनीय स्रोतों के मुताबिक, यह बदलाव युवाओं की मांगों का सीधा नतीजा है.
मोरक्को में हाल के हफ्तों में 'जेन जेड 212' नामक समूह ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाया. 2025 के अफ्रीका कप ऑफ नेशंस और 2030 फीफा वर्ल्ड कप की तैयारी के नाम पर हो रहे अरबों डॉलर के खर्च पर गुस्सा भड़का. बेहतर स्कूल, अस्पताल और आजादी की मांग के साथ सड़कें भर गईं. तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, लेकिन युवाओं का संकल्प कमजोर नहीं पड़ा.
ये आंदोलन सिर्फ अफ्रीका तक सीमित नहीं. इंडोनेशिया और नेपाल में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए, जहां नेपाल की सरकार गिर गई. बोत्सवाना में युवा वोटरों ने सत्ता में 60 साल पुरानी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया. दक्षिण अफ्रीका में एएनसी का वोट शेयर 50% से नीचे खिसक गया, क्योंकि युवा आर्थिक नाकामी से नाराज थे.
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया ने इन प्रदर्शनों को तेज और अप्रत्याशित बना दिया है, लेकिन जड़ में समस्या वही है – अवसरों की कमी.
सेनेगाली अर्थशास्त्री और लेखक नडोंगो सिल्ला कहते हैं, "युवा समृद्धि और उम्मीद चाहते हैं, लेकिन उन्हें कुछ दिख ही नहीं रहा." अफ्रीका के 1.4 अरब लोगों में आधे से ज्यादा 25 साल से कम उम्र के हैं. अगर सरकारें ने सुध न ली, तो यह तूफान पूरे महाद्वीप को हिला सकता है.
जेन जी क्या है: डिजिटल युग की बेबाक पीढ़ी, जो दुनिया बदल रही है
अगर आप 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए हैं, तो बधाई हो, आप जेन जी का हिस्सा हैं! यह पीढ़ी, जिसे अक्सर 'जूमर्स' भी कहा जाता है, अब दुनिया की सबसे प्रभावशाली ताकत बन रही है. महज 10-28 साल की उम्र में ये युवा सोशल मीडिया के मास्टर हैं, पर्यावरण संरक्षण से लेकर सामाजिक न्याय तक हर मुद्दे पर आवाज बुलंद कर रहे हैं. लेकिन क्या बनाती है इन्हें इतना खास?
जेन जी को 'डिजिटल नेटिव्स' कहा जाता है, क्योंकि ये बचपन से ही स्मार्टफोन और इंटरनेट के साथ बड़े हुए. महामारी ने इन्हें और मजबूत बनाया, जहां वर्चुअल दुनिया में दोस्ती, पढ़ाई और नौकरी सब कुछ संभव हो गया. आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में इनकी आधी आबादी विविध जातियों से आती है – 25% हिस्पैनिक, 15% अफ्रीकी-अमेरिकी और बाकी एशियाई व अन्य. ये नौकरी को लेकर व्यावहारिक हैं, बचत पर जोर देते हैं, लेकिन चिंता और तनाव से जूझते भी हैं. एआई जैसी तकनीकों से बड़ी उम्मीदें रखते हैं और यात्रा का शौक रखते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि जेन जी कम शराब पीते हैं, किशोरावस्था में गर्भधारण कम करते हैं और पढ़ाई-कैरियर पर फोकस रखते हैं. ये मिलेनियल्स (1981-1996) के बाद आते हैं और जेन अल्फा (2010 के बाद) से पहले. अफ्रीका से अमेरिका तक, ये युवा आंदोलनों का चेहरा हैं – चाहे जलवायु परिवर्तन हो या आर्थिक असमानता.
"जेन जी सिर्फ उपभोक्ता नहीं, ये बदलाव लाने वाले हैं," कहते हैं मैकिंसे की रिपोर्ट. अगर सरकारें और कंपनियां इनकी मांगें न सुनीं, तो आने वाला दशक इनके इशारे पर चलेगा.