जिस रूस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया था वहीं से डीजल ले रहा है!
कभी वैश्विक मंचों से रूस पर आर्थिक प्रतिबंध थोपकर अमेरिका खुद को कड़ा दिखाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं. मध्यावधि चुनावों में हार के डर ने अमेरिका को उसी रूस के आगे हाथ फैलाने पर मजबूर कर दिया है.
सीजीखबर डेस्क। रायपुर: राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई स्थायी शत्रु, बस स्थायी होते हैं तो केवल अपने राजनीतिक हित. इसका सबसे ताजा और सबसे बड़ा प्रमाण अमेरिका में देखने को मिल रहा है, जहां जो बाइडन और बाद में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन ने कभी रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों का जाल बिछाया था, आज वही वाशिंगटन अपने ही बनाए नियमों को ताक पर रखकर मास्को से डीजल खरीदने को मजबूर हो गया है. व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में बैठकर पूरी दुनिया पर दरोगागिरी करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सुर अचानक बदल गए हैं. जिस रूस को अलग-थलग करने के लिए अमेरिका दुनिया भर के देशों पर दबाव बनाता आया था, आज उसी रूस से तेल से भरे टैंकर अमेरिका के बंदरगाहों की ओर रवाना हो रहे हैं.
मास्को द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, उका पहला टैंकर एक गुप्त अमेरिकी बंदरगाह के लिए रवाना हो रहा है. यह आपूर्ति एक व्यापक योजना का हिस्सा है, जिसके तहत रूस अमेरिका को अधिक ईंधन भेजेगा. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब रूस खुद घरेलू स्तर पर आपूर्ति की समस्याओं का सामना कर रहा है और दूसरी तरफ अमेरिकी उपभोक्ता पेट्रोल-डीजल की लगातार ऊंची दरों से परेशान हैं.
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब जनता का डर और जनाक्रोश सिर पर मंडराने लगता है, तो बड़े से बड़े ताकतवर शासक भी अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर हो जाते हैं.
मध्यावधि चुनाव का खौफ और ट्रंप की बदलती नीतियां
अमेरिका में अगले महीने होने वाले मध्यावधि चुनाव डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन चुके हैं. देश में महंगाई, विशेष रूप से ईंधन की आसमान छूती कीमतों ने अमेरिकी नागरिकों के पसीने छुड़ा दिए हैं. डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के कारण रसद, परिवहन और दैनिक उपभोग की वस्तुएं बेहद महंगी हो गई हैं. अमेरिकी जनता का यह जन-उभार सीधा चुनाव में दिखाई देने लगा है. सर्वेक्षणों के अनुसार, अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर जनता का भरोसा रिपब्लिकन पार्टी से उठ रहा है और डेमोक्रेट्स को बढ़त मिलती दिख रही है.
ट्रंप यह भली-भांति जानते हैं कि यदि इन मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार होती है, तो यह सीधे तौर पर उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक हार मानी जाएगी. यदि संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का बहुमत आ गया, तो वे ट्रंप की हर एक नीति, कानून और फैसले के खिलाफ संसद में तलवार लेकर खड़े हो जाएंगे. उनका बचा हुआ कार्यकाल भारी अवरोधों और जांचों के बीच बितेगा. संसद में डेमोक्रेट्स का नियंत्रण ट्रंप की पूरी राजनीतिक शक्ति को पंगु बना सकता है. इसी हार के खौफ और संसद पर नियंत्रण खोने के डर ने ट्रंप को मास्को के प्रति अपनी नीति में 180 डिग्री का यू-टर्न लेने पर विवश कर दिया.
वैश्विक दरोगागिरी बनाम घरेलू मजबूरी
बीते कुछ वर्षों तक अमेरिका ने दुनिया भर के देशों, जिनमें भारत और चीन भी शामिल हैं, को धमकी दी थी कि वे रूस से सस्ता कच्चा तेल न खरीदें. वैश्विक बाजारों में नैतिकता की बातें करने वाले अमेरिका ने खुद को दुनिया का 'थानेदार' मान लिया था. लेकिन जैसे ही उसके अपने घर में महंगाई की आग भड़की, उसकी यह दरोगागिरी धरी की धरी रह गई. ट्रंप ने रूस पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ और नए प्रतिबंधों की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और चोरी-छिपे रूसी डीजल के आयात को हरी झंडी दे दी.
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि रूस से मिलने वाला यह डीजल अमेरिका की दैनिक खपत की तुलना में बेहद मामूली है और यह रातों-रात कीमतें नहीं घटा सकता. लेकिन यह कदम ट्रंप द्वारा अपनी ही जनता को यह दिखाने की एक घबराहट भरी कोशिश है कि वे महंगाई कम करने के लिए हर संभव कदम उठा रहे हैं.
चुनावी दबाव से जनता को राहत का संकेत
यह घटनाक्रम इतिहास का एक बड़ा सबक प्रस्तुत करता है: जब तक शासकों को अपनी कुर्सी का डर नहीं होता, वे जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते. लोकतंत्र में चुनाव ही वह एकमात्र हथियार है जिसके दबाव में आकर कठोर से कठोर शासक को भी अपने फैसले वापस लेने पड़ते हैं. ट्रंप द्वारा रूस से डीजल खरीदने का फैसला कोई कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर चुनावी हार के डर से उपजी एक भारी विवशता है. अंततः चुनावी दबाव ही वह एकमात्र शक्ति साबित हुई है जिसने सत्ता के अहंकार को झुकाकर जनता को थोड़ी ही सही, लेकिन राहत की उम्मीद प्रदान की है.