ट्रंप का कैपिटलिज्म: US में चीन की तर्ज पर सरकारी नियंत्रण की कोशिश?
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां वैश्विक आर्थिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं. वे निजी कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी बढ़ाकर 'क्रोनी कैपिटलिज्म' या 'राज्य पूंजीवाद' की ओर बढ़ रहे हैं. सेमीकंडक्टर, स्टील, ऑटोमोबाइल और रक्षा जैसे क्षेत्रों की प्रमुख कंपनियों के शेयर खरीदकर ट्रंप सरकार इन पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती है. हाल ही में लिथियम अमेरिकास, इंटेल और एमपी मटेरियल्स जैसी कंपनियों के शेयर खरीदे गए, जिसकी घोषणा ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर गर्व के साथ की.
ऐतिहासिक संदर्भ
अमेरिकी अर्थव्यवस्था परंपरागत रूप से मुक्त बाजार की समर्थक रही है, जिसके दम पर यह विश्व की नंबर एक अर्थव्यवस्था बनी. लेकिन ट्रंप का यह कदम समाजवादी नीतियों की ओर इशारा करता है, जिसे विश्लेषक रूस, चीन और भारत जैसे देशों की नीतियों से तुलना कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, सितंबर 2025 में जापान की निप्पॉन स्टील ने यूनाइटेड स्टेट्स स्टील को खरीदा, लेकिन ट्रंप ने शर्त रखी कि कंपनी का 'गोल्डन शेयर' अमेरिकी सरकार के पास रहेगा. इससे जापानी कंपनी को पूर्ण नियंत्रण नहीं मिल सका.
इतिहास में, 1925 में जर्मनी के राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडेनबर्ग ने रक्षा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया. 1933 में हिटलर ने सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए इन कंपनियों को भारी अनुदान और उत्पादन के आदेश दिए, जिसका परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) रहा. रूस में 1917 की क्रांति के बाद लेनिन ने 1921 में 'नई आर्थिक नीति' (एनईपी) लागू की, जिसके तहत भारी उद्योग राष्ट्रीयकृत हुए. भारत में 1947 में नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं के तहत सरकारी उपक्रम बनाए, लेकिन निजी क्षेत्र को भी बढ़ने दिया.
ट्रंप की नीति की खासियत
ट्रंप की नीति में सरकार नई कंपनियां नहीं बनाएगी, बल्कि मौजूदा कंपनियों में 10% शेयर लेकर नियंत्रण हासिल करेगी. इससे लाभांश सरकारी खजाने में आएगा, लेकिन संचालन का खर्च नहीं उठाना पड़ेगा. उदाहरण के लिए, लिथियम अमेरिकास के साथ शेयर खरीद की बातचीत चल रही है. यह नीति पूंजीवाद या समाजवाद का पूर्ण समर्थन नहीं करती, बल्कि एक मिश्रित मॉडल है.
खतरे और आलोचनाएं
इस नीति से मुक्त चिंतन पर खतरा है. सरकारी हिस्सेदारी के कारण कंपनियां राष्ट्रपति की आलोचना नहीं कर पाएंगी. सरकार इनका राजनीतिक दुरुपयोग कर सकती है और सूचना विकृत करने की आशंका है. 'एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट' के माइकल स्टेन ने चेतावनी दी कि सरकारी हस्तक्षेप से अक्षमता बढ़ेगी. कुछ लोग ट्रंप पर व्यक्तिगत लाभ के आरोप लगाते हैं, जैसे अगस्त 2025 में एप्पल के सीईओ टिम कुक द्वारा व्हाइट हाउस में 24 कैरेट सोने का सिक्का उपहार देना.
जोखिम
विश्लेषकों ने कई जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया:
नियंत्रण की सीमा: अमेरिका में बहुदलीय व्यवस्था है, इसलिए 10% शेयर से पूर्ण नियंत्रण मुश्किल है.
आर्थिक जोखिम: शेयरों के साथ घाटा और ऋण का बोझ भी सरकार पर पड़ेगा.
वैश्विक असर: अमेरिकी सरकार की हिस्सेदारी से वैश्विक ग्राहक दूरी बना सकते हैं, क्योंकि गूगल या चैटजीपीटी से फर्जी जानकारी फैलने का डर है.
पहले के उदाहरण
2008 की मंदी में बुश प्रशासन ने एआईजी, जनरल मोटर्स और क्रिसलर को पैकेज देकर उनके शेयर लिए, लेकिन बाद में बेच दिए. ट्रंप की नीति को चीनी मॉडल की नकल माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य उत्पादन में अमेरिका को शीर्ष पर लाना है. लेकिन इस रास्ते में कई जोखिम वैश्विक अर्थव्यवस्था और मुक्त चिंतन को प्रभावित कर सकते हैं.