चंद्रमा को लेकर वैज्ञानिकों के पुराने दावों पर उठे सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: सदियों से कवियों की कल्पनाओं और आम इंसानों के कौतूहल का केंद्र रहा चंद्रमा एक बार फिर सुर्खियों में है. चांद की सतह पर दिखने वाले जिन्हें हम 'कलंक' कहते हैं, वे वास्तव में विशाल गड्ढे और घाटियां हैं. अब चीन के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए शोध ने चंद्रमा के बनने और उसके गड्ढों के इतिहास से जुड़े दशकों पुराने सिद्धांतों को चुनौती दे दी है.
यदि यह नई थ्योरी साबित हो जाती है, तो हमारे सौर मंडल और पृथ्वी के शुरुआती इतिहास को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल सकता है.
चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर इस तरह घूमता है कि उसका एक ही हिस्सा हमेशा हमारी आंखों के सामने रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा हमेशा छिपा रहता है. अब तक अमेरिका और रूस जैसे देशों ने चंद्रमा के दिखाई देने वाले हिस्से पर ही अपने अध्ययन केंद्रित किए थे.
इसी आधार पर वैज्ञानिकों का मानना था कि लगभग 390 करोड़ साल पहले चंद्रमा पर अंतरिक्ष से भारी संख्या में विशाल उल्कापिंड टकराए थे. इस दौर को विज्ञान की भाषा में 'लेट हेवी बॉम्बार्डमेंट' कहा जाता है.
हालांकि, चीन का 'चांग'ई-6' (Chang'e-6) अंतरिक्ष यान वर्ष 2024 में चंद्रमा के दूरस्थ यानी छिपे हुए हिस्से से मिट्टी और चट्टानों के दुर्लभ नमूने लेकर पृथ्वी पर लौटा. 'साइंस एडवांसेज' पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में 'गुआंगझोउ इंस्टीट्यूट ऑफ जियोकेमिस्ट्री' के प्रोफेसर वानफेंग झांग और उनकी टीम ने इन नमूनों का गहन विश्लेषण किया है.
शोधकर्ताओं ने चंद्रमा से लाए गए 28 पत्थर के टुकड़ों की जांच की, जो अतीत में हुए भयानक टकरावों के कारण अत्यधिक गर्मी से पिघल गए थे और बाद में धीरे-धीरे ठंडे होकर जम गए.
वैज्ञानिकों ने विशेष तकनीकों का उपयोग करके इन पत्थरों के पिघलने का समय निर्धारित किया. जांच में पाया गया कि इन पत्थरों की उम्र 113 करोड़ से लेकर 433 करोड़ साल के बीच है. इनमें से दो चट्टानी टुकड़े लगभग 433 करोड़ वर्ष पुराने पाए गए.
चंद्रमा के छिपे हुए हिस्से पर इतने प्राचीन टकराव के सबूत पहली बार मिले हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि चंद्रमा पर गड्ढों का निर्माण किसी एक संक्षिप्त या अचानक हुई तबाही का नतीजा नहीं था. इसके विपरीत, चंद्रमा पर अरबों वर्षों से लगातार छोटे-बड़े उल्कापिंडों की बौछार होती रही है. यह एक लंबी और सतत प्रक्रिया थी, न कि केवल एक निश्चित कालखंड में हुई घटना.
इस नई खोज ने वैज्ञानिकों को सौर मंडल के शुरुआती दिनों को फिर से समझने का अवसर दिया है.
हालांकि, दुनिया भर के कुछ अन्य वैज्ञानिक इस नए दावे को लेकर सतर्क हैं. उनका तर्क है कि चंद्रमा के एक छोटे से हिस्से से मिले नमूनों के आधार पर पूरे चंद्र इतिहास का अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी हो सकता है.
यह भी संभव है कि ये पिघली हुई चट्टानें किसी प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोट के कारण सतह पर आई हों. बहरहाल, चंद्रमा का दूरस्थ हिस्सा अब विज्ञान जगत के लिए रहस्यों का नया द्वार बन चुका है और आगे के विस्तृत अध्ययन ही इस महान आकाशीय पहेली से पर्दा उठा सकेंगे.