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HC का डॉक्टरों को निर्देश: पर्ची स्पष्ट और बड़े अक्षरों में लिखें

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01 सित. 2025, 12:31 AM 3 मिनट में पढ़ें 2

हाईकोर्ट
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चंडीगढ़ । डेस्क: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शारीरिक स्थिति और इलाज की प्रगति के बारे में जानने का अधिकार है, जो जीने के अधिकार का हिस्सा है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह अधिकार नागरिकों को प्राप्त है.


न्यायालय ने डॉक्टरों को निर्देश दिया है कि वे प्रिस्क्रिप्शन इस तरह लिखें कि मरीज उसे आसानी से समझ सकें. प्रिस्क्रिप्शन को स्पष्ट लिखावट में लिखना अनिवार्य है. जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी में बड़े अक्षरों (कैपिटल) में या टाइप करके प्रिस्क्रिप्शन देना होगा. अदालत ने यह भी कहा कि मरीज को यह जानने का अधिकार है कि उसका इलाज कैसे हो रहा है. इसके लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को डॉक्टरों की लिखावट सुधारने के लिए प्रशिक्षण देने का निर्देश दिया गया है.

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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति यशगुरप्रीत सिंह पुरी ने दी. यह मामला तब सामने आया जब एक व्यक्ति द्वारा अंतरिम जमानत के लिए आवेदन किया गया, जिसमें एक महिला ने नौकरी का लालच देकर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. पीड़िता की मेडिको-लीगल रिपोर्ट को पढ़ने में अदालत को कठिनाई हुई, क्योंकि वह पूरी तरह अस्पष्ट थी. न्यायमूर्ति पुरी ने कहा, "रिपोर्ट का एक भी शब्द या अक्षर पढ़ा नहीं जा सका, जिसने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया."


न्यायालय ने पंजाब, हरियाणा और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि जब तक टाइप किए गए या डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन लागू नहीं हो जाते, तब तक प्रिस्क्रिप्शन में दवाइयों और इलाज की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से लिखा जाए. अदालत ने डॉक्टरों का सम्मान करते हुए कहा कि उनकी सेवा को वह सराहती है, लेकिन नागरिकों के हितों की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.


पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों ने इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन कुछ ने प्रिस्क्रिप्शन को चिकित्सा दस्तावेज के रूप में मानने पर सवाल उठाए हैं. डॉ. श्यामाशीष बंद्योपाध्याय ने कहा कि डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन सुविधाजनक हैं, लेकिन इससे लागत बढ़ सकती है. खासकर चिकित्सा शिविरों में टाइप्ड प्रिस्क्रिप्शन देना संभव नहीं है. उन्होंने कहा, "प्रिस्क्रिप्शन मरीज और डॉक्टर के बीच संवाद का माध्यम है, न कि कोई पत्र या प्रेम पत्र."


डॉ. अभिजीत चौधरी ने कहा, "हाई कोर्ट के इस फैसले का स्वागत है. यदि मरीज प्रिस्क्रिप्शन को पढ़कर समझ नहीं पाते, तो यह समस्या है. प्रिस्क्रिप्शन को मरीज की समझने योग्य भाषा, खासकर मातृभाषा में लिखना चाहिए." 


हालांकि, उन्होंने एनएमसी को प्रशिक्षण देने का निर्देश देने को 'यूटोपियन' (काल्पनिक) बताया. उन्होंने डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन को बढ़ावा देने की वकालत की.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP