MP ने SC से की 50% आरक्षण सीमा को 'लचीला' मानने की अपील की
नई दिल्ली । डेस्क: मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर कर 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को "लचीला" मानने की मांग की है. राज्य का कहना है कि विशेष परिस्थितियों में इस सीमा को पार किया जा सकता है, खासकर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले कानून को वैध ठहराने के लिए.
यह मामला 1992 के मंडल कमीशन फैसले में स्थापित 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा को चुनौती देता है, जिसे नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने निर्धारित किया था.
राज्य सरकार की ओर से पेश की गई याचिका में तर्क दिया गया है कि ओबीसी समुदाय, जो राज्य की आबादी का 51 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है, लंबे समय से सामाजिक अलगाव और बहिष्कार का शिकार रहा है.
2011 की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (एससी) 15.6 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) 21.1 प्रतिशत और ओबीसी 51 प्रतिशत से अधिक हैं. इन वंचित समुदायों की कुल आबादी 87 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन पहले ओबीसी को केवल 14 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा था, जो उनकी जनसांख्यिकीय हिस्सेदारी और शैक्षिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अनुपात में अपर्याप्त था. इसलिए, 27 प्रतिशत आरक्षण की वृद्धि को संवैधानिक रूप से अनिवार्य सुधार बताया गया है.
मध्य प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) संशोधन अधिनियम, 1994 के धारा 4 को 2019 में संशोधित किया गया, जिससे ओबीसी कोटा बढ़ा.
राज्य का दावा है कि यह वृद्धि गरीबी, पीढ़ीगत हाशिए पर धकेलाव और 94 ओबीसी जाति-उपजातियों की पारंपरिक, मामूली और कृषि-संबंधी आजीविकाओं से उपजी असाधारण स्थिति को दूर करने के लिए आवश्यक है. मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया कि ये समुदाय अभी भी हाशिए पर हैं, जहां शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है.
राज्य ने 1980 में कांग्रेस सरकार द्वारा गठित महाजन आयोग की रिपोर्ट का भी जिक्र किया. आयोग ने पाया था कि ओबीसी समुदाय को गंभीर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसमें बैठने और भोजन की प्रथाओं में अलगाव शामिल है. लगभग 90 प्रतिशत ओबीसी कच्चे घरों में रहते हैं, जहां सुविधाएं न्यूनतम हैं.
राजनीतिक रूप से, विधानसभा में ओबीसी प्रतिनिधित्व 16 प्रतिशत से कम था, जबकि सभी वर्गों में उनकी हिस्सेदारी केवल 8.241 प्रतिशत थी.
1981 की जनगणना के अनुसार ओबीसी आबादी 48.08 प्रतिशत होने के बावजूद, शिक्षा, नौकरियों और राजनीति में उनकी उपस्थिति घोर असंतुलित थी. आयोग ने 35 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी, जो वर्तमान 27 प्रतिशत से कहीं अधिक है.
मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का भी उल्लेख किया, जैसे जयश्री लमणराव पाटिल मामले में, जहां 50 प्रतिशत सीमा में अपवाद की अनुमति दी गई थी. राज्य का तर्क है कि विशेष परिस्थितियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण संभव है, बशर्ते राज्य असाधारण और बाध्यकारी कारणों का प्रमाण दे.
ऐसे मामलों में कठोर जांच जरूरी है, लेकिन संवैधानिक रूप से छूट दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने कई बार 50 प्रतिशत सीमा को "लचीला दिशानिर्देश" करार दिया है, न कि अपरिवर्तनीय संवैधानिक बाधा.
यह मुद्दा तेजी से गति पकड़ रहा है.
छत्तीसगढ़ ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जहां उसके कुछ जिलों में 85 प्रतिशत तक आरक्षण की अनुमति है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित कई याचिकाओं, जिसमें शिवम गौतम की मुख्य याचिका (वकील प्रथ्वी राज चौहान द्वारा पेश) शामिल है, को सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए स्थानांतरित कर लिया है. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की अगुवाई वाली बेंच ने 1994 अधिनियम के 2019 संशोधन की वैधता की जांच के लिए सहमति दी है.
राज्य के वकील मृणाल गोपाल एलकर ने बताया कि हाईकोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई के कारण 2022 से 12 सरकारी विभागों में भर्तियां रुकी हुई हैं. इसलिए, कोर्ट ने मामले को तत्काल सुनवाई के लिए 8 अक्टूबर की तारीख दी है.
यह फैसला न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश के आरक्षण नीति पर असर डाल सकता है, जहां सामाजिक न्याय और संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन की बहस तेज हो रही है.
राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम वंचित वर्गों को समानता और कल्याण प्रदान करने की दिशा में एक आवश्यक कदम है, जो संविधान की मूल भावना के अनुरूप है.