क्या डोनाल्ड ट्रंप अपराजेय हैं?
त्वरित टिप्पणी । जेके कर: गुरूवार को ही वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रीगेज़ गोमेज़ ने तेल क्षेत्र के निजीकरण को मंज़ूरी देने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं और इस पर वहाँ की संसद ने भी अपनी मुहर लगा दी है. इस फैसले के साथ ही अमेरिकी और अन्य विदेशी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों के लिए वेनेजुएला के तेल क्षेत्र एक बार फिर खुल गए हैं.
यह घटनाक्रम केवल वेनेजुएला तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक गहरे सवाल को जन्म देता है कि क्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपराजेय हैं, या फिर असल में अपराजेय वे तेल निगम हैं जिनके हितों की रक्षा के लिए यह पूरी प्रक्रिया संचालित की जा रही है.
वेनेजुएला में तेल उद्योग का सरकारीकरण पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ के कार्यकाल से जुड़ा रहा है. चावेज़ 1999 में चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे और उसके बाद उन्होंने देश को समाजवादी रास्ते पर आगे बढ़ाया. उनकी नीतियों का केंद्र राष्ट्रीय संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण था. 2013 में चावेज़ के निधन के बाद निकोलस मादुरो लोकतांत्रिक चुनाव के माध्यम से राष्ट्रपति बने.
मादुरो के कार्यकाल में अमेरिका ने अनेक आर्थिक प्रतिबंध लगाए, राजनीतिक दबाव बनाया, लेकिन इसके बावजूद वह वेनेजुएला के तेल क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के लिए खोलने में सफल नहीं हो सका.
जो काम बराक ओबामा और जो बाइडेन जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति भी नहीं कर सके, वह डोनाल्ड ट्रंप ने कर दिखाया. बेशक, ओबामा के कार्यकाल में अमेरिकी सेना ने 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में छापा मारकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, लेकिन तब भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह कल्पना नहीं की थी कि वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति को सत्ता से हटाकर वहाँ के तेल क्षेत्र पर सीधे विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा कराया जा सकता है.
निकोलस मादुरो के रहते यह अमेरिका के लिए संभव नहीं था, लेकिन उनके अपदस्थ होने के बाद बनी अंतरिम सरकार के ज़रिये यह काम कर लिया गया.
डेल्सी रोड्रीगेज़, जो पहले उपराष्ट्रपति थीं, अंतरिम राष्ट्रपति बनीं और उन्होंने उस निजीकरण कानून पर हस्ताक्षर कर दिए जिसे अमेरिका लंबे समय से चाहता था. इस निर्णय ने यह साफ कर दिया कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन में गहरा अंतर होता है. सत्ता बदलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन व्यवस्था को बदलने के लिए जनता का सक्रिय समर्थन ज़रूरी होता है, जो इस पूरे घटनाक्रम में अनुपस्थित दिखाई देता है.
दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पहले से कहीं अधिक आक्रामक हो गई है. उनका प्राथमिक लक्ष्य अमेरिकी कंपनियों, विशेषकर तेल और खनिज क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अधिकतम मुनाफ़ा दिलाना है. इसी क्रम में उनकी निगाह खनिज संसाधनों से भरपूर ग्रीनलैंड और तेल-संपन्न ईरान पर भी है.
ईरान के आंतरिक हालात में हस्तक्षेप के लिए अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है और उसे केवल सही मौके तथा ट्रंप के आदेश का इंतज़ार है. यदि ऐसा हुआ तो आशंका है कि ईरान के तेल क्षेत्र पर भी विदेशी तेल कंपनियों का वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की जाएगी. किसी ने सही कहा है कि जिस जमीन के नीचे तेल है वहां पर जमीन के ऊपर अमेरिकी सेना किसीन किसी बहाने तैनात है.
हालाँकि ट्रंप हर जगह सफल नहीं हो पाते. चीन के मामले में अमेरिका आज भी असहज है. ट्रंप द्वारा चीन पर टैरिफ़ लगाए जाने के बाद चीन ने भी उसी तीव्रता से जवाबी टैरिफ़ लगाए थे. सैन्य ताकत के बल पर चीन को झुकाना अमेरिका के लिए संभव नहीं है, यही कारण है कि इस मोर्चे पर ट्रंप को पीछे हटना पड़ा.
इसी तरह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी अमेरिकी दबाव में नहीं आते. अमेरिका रूस को यूक्रेन युद्ध को लेकर टैरिफ़ और प्रतिबंधों की धमकी तो देता है, लेकिन वह रूस को अपनी शर्तों पर समझौता करने के लिए मजबूर नहीं कर पाया है.
भारत भी ट्रंप की हर नीति के साथ खड़ा नहीं दिखता. ट्रंप की टैरिफ़ रणनीति का मुकाबला करने के लिए भारत ने अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंध मज़बूत किए हैं. हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता इस बात का संकेत है कि भारत अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है और किसी एक महाशक्ति के दबाव में नहीं है.
इतिहास यह भी बताता है कि सत्ता परिवर्तन तभी स्थायी होता है जब उसके पीछे जनता की मज़बूत भागीदारी होती है. क्यूबा में 1959 में फिदेल कास्त्रो ने सैन्य कार्रवाई के ज़रिये बतिस्ता शासन को सत्ता से हटाया था और उस समय जनता उनके साथ खड़ी थी.
आज यह प्रश्न बना हुआ है कि वर्तमान क्यूबा में जनता सत्ता के साथ कितने समय तक खड़ी रहेगी. यही सवाल वेनेजुएला पर भी लागू होता है, जहाँ सत्ता तो बदली, लेकिन जनता की संगठित भूमिका स्पष्ट नहीं दिखाई देती.
वेनेजुएला का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि केवल चुनाव जीतकर या सत्ता बदलकर व्यवस्था में गहरा और स्थायी परिवर्तन नहीं किया जा सकता. व्यवस्था बदलने के लिए जनता का सक्रिय, सजग और संगठित समर्थन अनिवार्य होता है.
डोनाल्ड ट्रंप सरकारों को गिरा सकते हैं, नेताओं को झुका सकते हैं और सत्ता से लड़ सकते हैं, लेकिन जहाँ जनता सत्ता के साथ मजबूती से खड़ी होती है, वहाँ उनकी कोई भी चाल सफल नहीं होती. इसलिए ट्रंप अपराजेय नहीं हैं, अपराजेय है जनता की सामूहिक चेतना और उसका संगठित संघर्ष.