NEP और केंद्रीयकृत परीक्षाओं से बढ़ा असंतोष- शिक्षाविद
नई दिल्ली । डेस्क: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), केंद्रीयकृत परीक्षाओं में धांधली और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण को लेकर देश भर में जारी आक्रोश के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. वरिष्ठ शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि केवल शिक्षा मंत्री का इस्तीफा युवाओं के असंतोष को शांत करने के लिए काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए पूरी शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधारों और विकेंद्रीकरण की सख्त जरूरत है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कार्यकारी परिषद सदस्य राजेश झा के अनुसार, एनईईटी (NEP) और सीयूईटी (CUET) जैसी परीक्षाएं एनईपी की केंद्रीयकृत नीतियों की ही उपज हैं, जो भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से घिरी हुई हैं.
उन्होंने कहा कि एक देश, एक परीक्षा का मॉडल पूरी तरह विफल साबित हो रहा है और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अनुदान कटौती व अनावश्यक प्रयोगों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए.
वहीं, उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. ओंकार सिंह का कहना है कि मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन (MCQ) आधारित कंप्यूटर टेस्ट उम्मीदवारों की वास्तविक योग्यता का आकलन नहीं कर सकते, बल्कि ये केंद्रीयकृत प्रणाली को पेपर लीक जैसी गड़बड़ियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं.
शिक्षाविदों ने यह भी रेखांकित किया है कि सरकारी संस्थानों को अनुदान की जगह ऋण देने की नीति और निजी संस्थानों के उभार ने शिक्षा को बेहद महंगा बना दिया है.
ए.एन. सिन्हा संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. सुनील राय और अन्य संकाय सदस्यों का मानना है कि पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार केवल एक घटना नहीं, बल्कि गहराई तक जड़ जमा चुके तंत्र की देन है.
लगातार बढ़ती बेरोजगारी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी ने देश के युवाओं को आंदोलन के रास्ते पर ला खड़ा किया है. विशेषज्ञों के मुताबिक, जब तक संस्थानों को स्वायत्तता नहीं दी जाएगी और राज्यों के स्तर पर पारदर्शी व विकेंद्रीकृत प्रवेश प्रक्रिया शुरू नहीं होगी, तब तक शिक्षा क्षेत्र का यह संकट हल होना संभव नहीं है.