ब्रिक्स पे: स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की ओर एक बड़ा कदम
नई दिल्ली । डेस्क: हाल ही में भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पश्चिमी प्रभुत्व को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है. इस दो दिवसीय सम्मेलन में ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल की महत्वाकांक्षी पहल 'ब्रिक्स पे' को आगे बढ़ाने और स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की गई. इस कदम को वैश्विक वित्तीय परिदृश्य में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो व्यापारिक लेन-देन को अधिक सुरक्षित और सहज बनाने का प्रयास है.
क्या है ब्रिक्स पे और यह कैसे काम करेगा
ब्रिक्स पे वास्तव में एक विकेंद्रीकृत डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसे पहली बार 2018 में प्रस्तावित किया गया था. इसका प्राथमिक उद्देश्य ब्रिक्स समूह में शामिल देशों के बीच सीमा पार लेन-देन को सरल और सुलभ बनाना है. यह प्रणाली सदस्य देशों के घरेलू भुगतान ढांचे को आपस में जोड़ती है. उदाहरण के लिए, भारत का यूपीआई और रुपे, रूस का मिर तथा ब्राजील का पिक्स अब एक-दूसरे के साथ सहजता से संवाद कर सकेंगे. इसके माध्यम से पर्यटक, आम नागरिक और व्यापारिक प्रतिष्ठान अपनी स्थानीय मुद्राओं में ही लेन-देन निपटा सकेंगे. इसमें भुगतान की प्रक्रिया को डिजिटल वॉलेट, क्यूआर कोड और मोबाइल ऐप के जरिए निष्पादित किया जाएगा, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता स्वतः ही कम हो जाएगी.
वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव
ब्रिक्स समूह की स्थापना 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी, जिसमें 2010 में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ. हाल के वर्षों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों के जुड़ने से अब इस ब्लॉक में 11 देश शामिल हो चुके हैं. यह समूह वर्तमान में दुनिया की लगभग 49 प्रतिशत आबादी और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है. इतनी विशाल आर्थिक और जनसांख्यिकीय शक्ति के साथ, यह समूह एक ऐसा वित्तीय विकल्प तैयार कर रहा है जो किसी एक देश या मुद्रा के नियंत्रण में न हो.
वर्तमान वैश्विक भुगतान प्रणाली और विकल्प की आवश्यकता
मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकांश व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन बेल्जियम स्थित 'स्वीफ्ट' नेटवर्क के जरिए संचालित होते हैं. दुनिया भर के 11,000 से अधिक वित्तीय संस्थान इस प्रणाली का उपयोग करते हैं. हालांकि, रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूसी बैंकों को स्वीफ्ट नेटवर्क से बाहर कर दिया गया था. इस भू-राजनीतिक घटनाक्रम और व्यापारिक प्रतिबंधों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक वैकल्पिक और सुरक्षित वित्तीय ढांचे के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. ब्रिक्स पे जैसी व्यवस्थाएं इन्हीं प्रतिबंधों और जोखिमों से बचाव के लिए एक व्यावहारिक विकल्प प्रदान करती हैं.
डॉलर को हटाने की नहीं, बल्कि विकल्प देने की रणनीति
विशेषज्ञों और ब्रिक्स पे के अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि इस पहल का उद्देश्य अमेरिकी डॉलर या स्वीफ्ट प्रणाली को पूरी तरह से समाप्त करना नहीं है. यह एक बहु-विकल्पीय और लचीला नेटवर्क ढांचा तैयार करने का प्रयास है, जिससे विभिन्न देश अपने राष्ट्रीय हितों और प्राथमिकताओं के अनुसार लेन-देन कर सकें. जो संस्थान या देश डॉलर का उपयोग जारी रखना चाहते हैं, वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे. हालांकि, यह प्रणाली एक ऐसा समानांतर मंच प्रदान करती है जो व्यापार को तेज, पारदर्शी, कम खर्चीला और सुरक्षित बनाता है.
भविष्य की वित्तीय संरचना और चुनौतियां
हालांकि ब्रिक्स पे अभी पायलट चरण में है और इसे पूरी तरह से लागू होने में समय लगेगा, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे के विखंडन और विविधीकरण का संकेत है. विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वीफ्ट के पास दशकों का अनुभव, नेटवर्क और विश्वास है, जिसे रातों-रात स्थापित नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद, यदि ब्रिक्स देश अपने घरेलू प्रणालियों को सफलतापूर्वक जोड़ने में सक्षम होते हैं, तो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार में डॉलर का एकाधिकार समाप्त होगा और एक बहु-ध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था का निर्माण होगा.