भारत में वायु प्रदूषण अब 'साइलेंट किलर'
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में वायु प्रदूषण अब केवल सांस की तकलीफ या धुंधले आसमान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुका है. 'इल्नेस टू वेलनेस' (ITW) सम्मेलन में स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक जहरीली हवा के संपर्क में रहने से स्ट्रोक, हृदय रोग, फेफड़ों के विकार और यहां तक कि अल्जाइमर जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है.
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर होने वाले लगभग 17 प्रतिशत स्ट्रोक अब सीधे तौर पर वायु प्रदूषण से जुड़े हैं.
सम्मेलन में इस बात पर चिंता जताई गई कि वायु प्रदूषण अब केवल सर्दियों की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह साल भर का संकट बन चुका है. आंकड़ों के अनुसार, गर्मियों के महीनों में भी कई भारतीय शहरों का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर 200–250 के बीच रहता है, जिसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मानकों के तहत 'खराब' श्रेणी में रखा गया है.
पूर्व स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने स्पष्ट किया कि प्रदूषित शहरों में लोग जीवित तो रह रहे हैं, लेकिन वे पुरानी बीमारियों के साथ जी रहे हैं, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता और देश के आर्थिक योगदान पर बुरा असर पड़ रहा है.
विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि मौजूदा सरकारी नीतियां जैसे नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम और भारत स्टेज उत्सर्जन मानक सराहनीय हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन अभी भी असमान है.
सम्मेलन में दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण पर एक नई रिपोर्ट भी जारी की गई, जिसमें लंदन और बीजिंग जैसे वैश्विक शहरों की तर्ज पर डेटा-आधारित नीतियों को अपनाने का सुझाव दिया गया है.
डॉक्टरों का मानना है कि अब समय केवल तकनीकी समाधान खोजने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने और बच्चों व कम आय वाले समुदायों जैसे संवेदनशील समूहों की रक्षा के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने का है.