क्या भारत के लिए रूस-ईरान का विकल्प बनेगा वेनेजुएला ?
नई दिल्ली । डेस्क: मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव और ईरान युद्ध के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के बंद होने से दुनिया भर में ऊर्जा का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है. इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए एक बड़ा रणनीतिक बदलाव किया है.
ताजा ऊर्जा ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार, इस महीने वेनेजुएला अचानक भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. वेनेजुएला से भारत को होने वाली तेल की आपूर्ति में अप्रैल के मुकाबले लगभग 50 प्रतिशत का भारी उछाल देखा गया है, जो यह दर्शाता है कि नई दिल्ली खाड़ी देशों से आपूर्ति बाधित होने के बाद तेजी से नए रास्ते तलाश रही है.
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने बढ़ाई भारत की मुश्किलें
आमतौर पर भारत अपनी जरूरत का लगभग आधा कच्चा तेल खाड़ी देशों से आयात करता है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है. इसके अलावा बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) और पेट्रोलियम गैस भी इसी मार्ग से आती है. लेकिन ईरान को केंद्र में रखकर जारी युद्ध की वजह से यह संकरा समुद्री मार्ग पूरी तरह असुरक्षित और दुर्गम हो चुका है.
हाल ही में भारत से जुड़े कई जहाजों को निशाना बनाया गया है, जिससे समुद्री सुरक्षा को लेकर नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ गई हैं. ओमान के तट के पास एक भारतीय ध्वज वाले मालवाहक जहाज पर ड्रोन या मिसाइल हमला हुआ, जिसके बाद वह डूब गया.
इस असुरक्षा के कारण भारत के 13 जहाज क्षेत्र में फंसे हुए हैं और सरकार अब वहां नए जहाज भेजने से कतरा रही है. इसके साथ ही, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण ईरान से भारत को मिलने वाला तेल पूरी तरह रुक गया है, जबकि सऊदी अरब से होने वाली आपूर्ति भी लगभग आधी रह गई है.
वेनेजुएला के तेल पर क्यों टिकी है वाशिंगटन और नई दिल्ली की नजरें
दुनिया में सबसे बड़ा तेल भंडार (लगभग 303 अरब बैरल) रखने के बावजूद वेनेजुएला वर्षों से अमेरिकी प्रतिबंधों और आंतरिक कुप्रबंधन के कारण वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी खो चुका था. लेकिन जनवरी में पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के हटने और वाशिंगटन समर्थित अंतरिम सरकार के आने के बाद समीकरण तेजी से बदले हैं.
अमेरिका अब वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को वैश्विक बाजार में धकेलने के लिए उत्सुक है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को नियंत्रित किया जा सके और शांति वार्ता में ईरान के प्रभाव को कम किया जा सके.
भारत के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील के बाद भारतीय रिफाइनरियों, विशेष रूप से गुजरात के जामनगर में स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज के विशाल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स के लिए यह तेल बेहद मुफीद है.
जामनगर परिसर दुनिया की उन चुनिंदा सुविधाओं में से एक है जो वेनेजुएला के इस अति-भारी और सल्फर युक्त कच्चे तेल को बेहद कुशलता से प्रोसेस कर सकती हैं.
अमेरिकी दबाव और रूस पर निर्भरता कम करने की चुनौती
यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत लगातार रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात कर रहा था, जिससे अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी लगातार असहज महसूस कर रहे थे. हालांकि वाशिंगटन ने समुद्र में पहले से लोड हो चुके रूसी तेल के टैंकरों के लिए 30 दिनों की प्रतिबंध छूट बढ़ा दी है, लेकिन विशेषज्ञ इसे केवल एक अल्पकालिक राहत मान रहे हैं.
अमेरिका लगातार भारत पर रूस से ऊर्जा निर्भरता कम करने का दबाव बना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले अमेरिकी और वेनेजुएला के तेल को अपनाने का संकेत दिया था, और अब वाशिंगटन चाहता है कि भारत इस वादे पर आगे बढ़े.
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय भारत के पास बहुत सीमित विकल्प बचे हैं या तो वह प्रतिबंधों के साए में घिरा रूसी तेल खरीदे या फिर अमेरिकी लाइसेंसिंग शर्तों के तहत आ रहे वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को अपनाए.
आगामी कूटनीतिक हलचल और भविष्य का रोडमैप
भारत की इस बढ़ती ऊर्जा जरूरत के बीच अगले हफ्ते नई दिल्ली में बड़ी कूटनीतिक हलचल होने वाली है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो व्यापार, रक्षा सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा पर बातचीत के लिए भारत आ रहे हैं. उनके साथ ही वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज के भी भारत आने की उम्मीद है, जहां वह तेल बिक्री के दीर्घकालिक समझौतों पर चर्चा करेंगी.
वर्तमान में वेनेजुएला से भारत को मिलने वाला तेल 4,17,000 बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया है, जबकि पिछले नौ महीनों में यह शून्य था. हालांकि वेनेजुएला से होने वाली तेल आय पर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग का कड़ा नियंत्रण रहेगा, लेकिन भारत के लिए यह अपनी आसमान छूती ऊर्जा खपत को पूरा करने और मध्य पूर्व के संकट से खुद को सुरक्षित रखने का एक बेहतरीन और व्यावहारिक अवसर साबित हो सकता है.