ईरान-अमेरिका युद्ध क्या पुतिन के लिए वरदान साबित होगा?
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ा भीषण युद्ध और ईरानी सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या ने मध्य पूर्व के साथ-साथ पूरी दुनिया की भू-राजनीति को हिलाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ दुनिया इस संघर्ष के विनाशकारी परिणामों को देख रही है, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि रूस इस युद्ध से रणनीतिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक लाभ उठाने की स्थिति में दिख रहा है.
मॉस्को दशकों से तेहरान का मुख्य अंतरराष्ट्रीय समर्थक रहा है, जिसने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों से उसे बचाया और अरबों डॉलर के हथियार बेचे. लेकिन वर्तमान स्थिति ने पुतिन के लिए अवसर के नए द्वार खोल दिए हैं. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खामेनेई की हत्या को "मानवीय नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सभी मानदंडों का सनकी उल्लंघन" करार दिया है, जबकि उनके करीबी दिमित्री मेदवेदेव ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तंज कसते हुए उन्हें एक ऐसा 'शांतिदूत' बताया जिसने अपना असली चेहरा दिखा दिया है.
हालांकि, इन बयानों के पीछे रूस के अपने आर्थिक और सामरिक हित छिपे हैं.
रूस के लिए सबसे तत्काल और बड़ा लाभ तेल राजस्व में वृद्धि के रूप में देखा जा रहा है. यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी प्रतिबंधों की मार झेल रहे रूसी यूराल्स कच्चे तेल की कीमत फरवरी के अंत में गिरकर 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी. लेकिन ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड में 13 प्रतिशत का उछाल आया और यह 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जिससे रूसी तेल की कीमत भी बढ़कर 57 डॉलर हो गई.
चूंकि रूस, ईरान और वेनेजुएला भारी कच्चे तेल के प्रमुख उत्पादक हैं और वेनेजुएला का तेल व्यापार अब वाशिंगटन के नियंत्रण में है, इसलिए वैश्विक रिफाइनरियों के पास रूसी यूराल्स तेल के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रूसी तेल की मांग बढ़ेगी क्योंकि रिफाइनरियों के लिए अपनी तकनीकी प्रक्रियाओं को बदलना बहुत महंगा और समय लेने वाला काम है. इससे रूस को न केवल अधिक पैसा मिलेगा, बल्कि वह वाशिंगटन के सामने प्रतिबंधों में ढील देने की शर्त भी रख सकता है ताकि अमेरिकी चुनावों से पहले वहां पेट्रोल की कीमतों को कम किया जा सके.
आर्थिक लाभ के अलावा, रूस इस युद्ध के माध्यम से खुद को एक वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. पुतिन ने पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता में मध्यस्थता की पेशकश की थी, जिसे वाशिंगटन ने नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन अब जबकि ट्रंप का ध्यान यूक्रेन युद्ध से हटकर ईरान पर केंद्रित हो गया है, रूस को अपनी नई रणनीति तैयार करने के लिए समय मिल गया है.
यूक्रेन युद्ध अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और रूस चाहता है कि यूक्रेन उन क्षेत्रों को छोड़ दे जो वर्तमान में कीव के नियंत्रण में हैं. मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य सहायता, विशेष रूप से पैट्रियट मिसाइल रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है.
अमेरिकी सहयोगियों की सुरक्षा के लिए इन मिसाइलों को मध्य पूर्व की ओर मोड़ा जा रहा है, जिससे यूक्रेन के पास रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों को गिराने के लिए संसाधनों की भारी कमी हो सकती है. यूक्रेनी सैन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि पैट्रियट मिसाइलों का उत्पादन कम है और वर्तमान मांग को देखते हुए इसकी कमी यूक्रेन के लिए घातक साबित हो सकती है.
हालांकि, यह स्थिति पुतिन के लिए केवल लाभ ही नहीं, बल्कि एक कठिन चुनौती भी पेश करती है. पुतिन को अब डोनाल्ड ट्रंप और तेहरान के शासन के बीच एक कठिन चुनाव करना होगा. तेहरान रूस के उन गिने-चुने गंभीर विदेशी साझेदारों में से एक है, लेकिन पुतिन ट्रंप के साथ भी संबंध खराब नहीं करना चाहते. इसके अलावा, खामेनेई की हत्या के बाद पुतिन की छवि पर भी सवाल उठ रहे हैं कि वे अपने सहयोगियों की रक्षा करने में अक्षम रहे हैं.
सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के मास्को भागने और वेनेजुएला के निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ईरान का यह संकट पुतिन के गठबंधन के लिए एक बड़ा झटका है. अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि ईरान में अमेरिकी कार्रवाई ने उस तर्क को कमजोर कर दिया है जो रूस द्वारा यूक्रेन की संप्रभुता के उल्लंघन के खिलाफ दिया जाता था. रूस अब खामेनेई की हत्या का उपयोग ताजिकिस्तान जैसे देशों के युवाओं को 'पश्चिमी साजिश' के खिलाफ भड़काने और उन्हें यूक्रेन में लड़ने के लिए भर्ती करने में कर सकता है.
यदि यह युद्ध लंबा खींचता है और यूरोप की ओर शरणार्थियों का पलायन शुरू होता है, तो इससे उन दक्षिणपंथी पार्टियों को फायदा होगा जो पुतिन के प्रति सहानुभूति रखती हैं. कुल मिलाकर, ईरान का युद्ध रूस के लिए एक ऐसा जटिल खेल है जहाँ वह एक तरफ अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, तो दूसरी तरफ अपने अंतरराष्ट्रीय रसूख को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है.