क्या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने से LPG और तेल के दाम घटेंगे?
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्धविराम समझौते और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की अचानक की गई घोषणा ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल तेज कर दी है. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 4 फीसदी गिरकर 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं, जो संकट के चरम पर 119 डॉलर तक पहुंच गई थीं.
ऐसे में अब भारतीय उपभोक्ताओं और बाजार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जलमार्ग के खुलने से देश में एलपीजी (रसोई गैस), पेट्रोल और डीजल के दाम सचमुच घटेंगे? इसका सीधा जवाब भारत की आयात निर्भरता और तेल कंपनियों के मौजूदा वित्तीय गणित में छिपा हुआ है, जिसका विश्लेषण करना बेहद जरूरी है.
भारत अपनी जरूरत का 88 फीसदी कच्चा तेल, 60 फीसदी एलपीजी और करीब आधी प्राकृतिक गैस आयात करता है. इसमें से आधा कच्चा तेल और 90 फीसदी एलपीजी खाड़ी देशों से इसी संकीर्ण जलमार्ग के जरिए भारत पहुंचती है. फरवरी के अंत में जब ईरान संकट के कारण यह रास्ता बंद हुआ, तो आपूर्ति ठप होने से हड़कंप मच गया था.
सरकार को वाणिज्यिक एलपीजी की सप्लाई में 30 फीसदी तक की कटौती करनी पड़ी थी और घरेलू रसोई गैस सिलेंडरों की रीफिलिंग अवधि बढ़ानी पड़ी थी. भले ही इस दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने रूस, अफ्रीका और अमेरिका से वैकल्पिक तेल का इंतजाम किया, लेकिन भारी मालभाड़ा और ऊंचे बीमा प्रीमियम के कारण लागत आसमान छूने लगी थी.
अब जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल रहा है, तो भारत के लिए सबसे बड़ी राहत शिपिंग और इंश्योरेंस के खर्चों में भारी गिरावट के रूप में आएगी. इसके बावजूद, आम जनता के लिए पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में तुरंत बड़ी कटौती की उम्मीद करना थोड़ी जल्दबाजी होगी.
इसका मुख्य कारण सरकारी तेल विपणन कंपनियों को हुआ भारी वित्तीय नुकसान है. युद्ध के दौरान जब कच्चा तेल $119 पर था, तब सरकार ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए मार्च में एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती कर खुदरा कीमतों को बढ़ने से रोका था.
चुनाव बाद तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल पर ₹7.50 और रसोई गैस पर दो किश्तों में ₹89 की बढ़ोतरी जरूर की, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय लागत के मुकाबले बहुत कम थी.
यही वजह है कि लागत और बिक्री मूल्य में बड़े अंतर के चलते देश की सरकारी तेल कंपनियां वर्तमान में लगभग ₹650 करोड़ रुपये प्रतिदिन का भारी घाटा उठा रही हैं. उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, इन कंपनियों ने महज एक तिमाही में उतना नुकसान झेल लिया है, जितना वे पूरे साल में मुनाफा कमाती हैं.
इसलिए, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने और ब्रेंट क्रूड के $84 पर आने से सबसे पहले तेल कंपनियों के इस दैनिक घाटे की भरपाई होगी. जब कंपनियों का अंडर-रिकवरी (लागत से कम पर बेचना) का संकट खत्म होगा और वैश्विक कीमतें इस स्तर पर या इससे नीचे कुछ हफ्तों तक स्थिर रहेंगी, तभी कंपनियां खुदरा कीमतों में कटौती का लाभ आम उपभोक्ताओं को देना शुरू करेंगी.
हालांकि, आने वाले हफ्तों में एलपीजी की राशनिंग और उपलब्धता का संकट पूरी तरह खत्म हो जाएगा, जिससे आपूर्ति सामान्य होगी.
यदि यह युद्धविराम समझौता लंबे समय तक टिकता है, तो मालभाड़े में कमी और सस्ते कच्चे तेल का फायदा अंततः भारतीय बाजार को मिलेगा. इससे न केवल पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम नीचे आएंगे, बल्कि लॉजिस्टिक्स, फर्टिलाइजर और विमानन जैसे ऊर्जा-संवेदनशील क्षेत्रों की लागत घटने से देश में चौतरफा महंगाई से बड़ी राहत मिलेगी.