तुर्की को क्यों बेचना पड़ रहा है सोना?
नई दिल्ली । डेस्क: दुनिया भर के केंद्रीय बैंक आम तौर पर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए सोने का भंडार बढ़ाने में जुटे हैं. लेकिन इसके विपरीत, 'यूरोप का बीमार इंसान' कहे जाने वाले तुर्की के रुख ने वित्तीय विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है. अंकारा लगातार अपना राष्ट्रीय स्वर्ण भंडार बेच रहा है, जिससे उनका खजाना लगभग खाली होने की कगार पर पहुंच चुका है. हालांकि, देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के बावजूद वहां के नेतृत्व का ध्यान अर्थव्यवस्था से ज्यादा एक शक्तिशाली सैन्य गठबंधन बनाने और अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण पर है. इस विरोधाभासी कदम ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है.
मात्र 14 दिनों में बेच डाला 58 टन सोना
अमेरिकी वित्तीय विश्लेषण फर्म 'द कोबेसी लेटर' द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, तुर्की के केंद्रीय बैंक ने महज दो हफ्तों के भीतर लगभग 58 टन सोना बेच दिया. इस बेचे गए सोने का बाजार मूल्य 800 करोड़ डॉलर (8 अरब डॉलर) से भी अधिक आंका गया है. मार्च के मध्य तक तुर्की ने पहले 6 टन सोना घटाया और फिर अगले ही हफ्ते 52 टन सोना बाजार में उतार दिया. इस भारी बिकवाली के बाद तुर्की का कुल स्वर्ण भंडार गिरकर 513 टन पर आ गया है, जो पिछले सात वर्षों में इसका सबसे निचला स्तर है. रिपोर्टों के अनुसार, इस बेचे गए सोने के एक बड़े हिस्से का उपयोग 'स्वैप डील' के जरिए डॉलर आयात करने के लिए किया गया, जबकि बाकी हिस्सा सीधे खुले बाजार में बेचा गया.
लीरा की गिरावट और आसमान छूती महंगाई
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, तुर्की द्वारा उठाए गए इस अप्रत्याशित कदम के पीछे मुख्य वजह उसकी घरेलू मुद्रा 'लीरा' का ऐतिहासिक अवमूल्यन है. डॉलर के मुकाबले लीरा की कीमत लगातार गिर रही है, जिससे देश में महंगाई दर बेकाबू हो गई है. अतीत में तुर्की की मुद्रास्फीति 85 प्रतिशत के घातक स्तर तक पहुंच गई थी. ईंधन और आवश्यक वस्तुओं के आयात पर अत्यधिक निर्भर रहने के कारण तुर्की को अपने विदेशी मुद्रा भंडार में से अरबों डॉलर खर्च करने पड़े. जब विदेशी मुद्रा भंडार एक निश्चित सीमा से नीचे चला गया, तो राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की सरकार के पास गिरती मुद्रा को संभालने और आयात बिलों का भुगतान करने के लिए अपने सोने के भंडार का इस्तेमाल करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा.
सामरिक महत्वाकांक्षाएं और ओटोमन साम्राज्य का सपना
एक तरफ जहां देश गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है, वहीं राष्ट्रपति एर्दोगन का ध्यान रक्षा और सैन्य प्रभाव बढ़ाने पर केंद्रित है. तुर्की ने हाल के दिनों में सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ नए सैन्य समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए हथियारों के निर्माण पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि तुर्की का यह रुख पुराने 'ओटोमन साम्राज्य' के प्रभाव को पुनर्जीवित करने की उसकी दीर्घकालिक राजनीतिक और भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित है. सीरिया, इराक और लीबिया में अपने सैन्य अभियानों और खुफिया गतिविधियों पर भारी वित्तीय संसाधन खर्च करने के कारण तुर्की का राजकोषीय ढांचा और अधिक दबाव में आ गया है.
रूस भी संकट से निपटने के लिए ले रहा है सोने का सहारा
दिलचस्प बात यह है कि इस वर्ष केवल तुर्की ही नहीं, बल्कि रूस ने भी अपने स्वर्ण भंडार का एक बड़ा हिस्सा बेचा है. यूक्रेन के साथ जारी लंबे संघर्ष और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए 16,000 से अधिक प्रतिबंधों के कारण रूस को भी अपनी राष्ट्रीय संपत्ति निधि (नेशनल वेल्थ फंड) से सोने की बिक्री करनी पड़ी है. इसके बावजूद, वैश्विक स्तर पर अमेरिका 8,000 टन से अधिक सोने के साथ शीर्ष पर बना हुआ है, जबकि भारत और चीन जैसे देश लगातार अपने भंडार में बढ़ोतरी कर रहे हैं. हालांकि, तुर्की जिस तरह से अपनी आर्थिक स्थिरता को दांव पर लगाकर सैन्य विस्तार में लगा है, उसने भविष्य के एक बड़े वित्तीय संकट की आशंका को बढ़ा दिया है.