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संयुक्त अरब अमीरात ने ओपेक की सदस्यता क्यों छोड़ी?

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28 अप्रै. 2026, 06:30 PM 4 मिनट में पढ़ें 2

OPEC
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नई दिल्ली । डेस्क: वैश्विक तेल राजनीति और ऊर्जा बाजार में उस समय एक बड़ा भूचाल आ गया जब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन 'ओपेक' (OPEC) और 'ओपेक+' से अपनी सदस्यता समाप्त करने की घोषणा कर दी. यूएई का यह ऐतिहासिक फैसला ऐसे नाजुक समय पर आया है जब ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध ने दुनिया को ऊर्जा संकट की कगार पर खड़ा कर दिया है. 


यूएई ने स्पष्ट किया है कि वह अब अन्य देशों के सामूहिक हितों के बजाय अपने "राष्ट्रीय हितों" को प्राथमिकता देगा. यह कदम शुक्रवार से प्रभावी होने जा रहा है, जो न केवल ओपेक की एकता को कमजोर करेगा, बल्कि वैश्विक तेल कीमतों में भी भारी अस्थिरता पैदा कर सकता है.

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यूएई के इस फैसले के पीछे का मुख्य कारण उसकी बदलती आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि है. यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल-मजरूई ने साफ किया कि यह निर्णय उत्पादन स्तर और भविष्य की ऊर्जा नीतियों के गहन विश्लेषण के बाद लिया गया है. 


ओपेक की उत्पादन कोटा प्रणाली के तहत सदस्य देशों को तेल उत्पादन को एक सीमित दायरे में रखना पड़ता है ताकि कीमतें ऊंची बनी रहें. लेकिन यूएई अब अपनी तेल उत्पादन क्षमता को ४.८ मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक बढ़ाने की महत्वाकांक्षा रखता है. 


विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन कोटा के भीतर रहकर यूएई को आर्थिक नुकसान हो रहा था, और अब वह "कम लागत वाले बैरल" का अधिक से अधिक उत्पादन कर बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करना चाहता है.


यूएई और ओपेक के सबसे बड़े नेता सऊदी अरब के बीच बढ़ते मतभेद भी इस विदाई की एक बड़ी वजह हैं. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय राजनीति, विशेषकर लाल सागर और यमन के मुद्दों पर खींचतान बढ़ी है. 


यमन युद्ध में एक समय साथ रहे इन दोनों देशों के रिश्ते पिछले साल दिसंबर में तब और खराब हो गए जब सऊदी अरब ने यूएई समर्थित अलगाववादियों के हथियार खेप पर बमबारी कर दी. इसके अलावा, यूएई ने ओपेक छोड़ने से पहले सऊदी अरब जैसे पुराने सहयोगियों से कोई सलाह-मशविरा भी नहीं किया, जो कि अरब देशों के बीच गहरे राजनीतिक अलगाव का संकेत है.


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ओपेक पर दुनिया को "लूटने" और तेल की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के आरोपों ने भी दबाव बनाया था. ट्रंप ने स्पष्ट रूप से खाड़ी देशों को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य सुरक्षा को तेल की कीमतों से जोड़ दिया था. 


साथ ही, ओपेक की बाजार शक्ति अमेरिका के बढ़ते कच्चे तेल उत्पादन के कारण पहले से ही कम हो रही थी. 


यूएई का बाहर जाना ओपेक के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि समूह ने अपना एक महत्वपूर्ण 'शॉक एब्जॉर्बर' खो दिया है. अब तेल की कीमतों को स्थिर रखने की पूरी जिम्मेदारी सऊदी अरब के कंधों पर आ गई है, जबकि यूएई अपनी शर्तों पर तेल बेचकर अपने आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने की राह पर निकल पड़ा है.


ओपेक (OPEC) यानी 'ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज' एक स्थायी अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना सितंबर 1960 में बगदाद सम्मेलन के दौरान ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला द्वारा की गई थी. इसका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों का समन्वय और एकीकरण करना है ताकि उपभोक्ताओं को तेल की कुशल, आर्थिक और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो सके और उत्पादकों को उनकी पूंजी पर उचित रिटर्न मिले. वर्तमान में ओपेक के 12 मुख्य सदस्य देशों में अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला शामिल हैं (नोट: कतर, अंगोला और इक्वाडोर जैसे देश अलग-अलग समय पर इसकी सदस्यता छोड़ चुके हैं).


ओपेक+ (OPEC+) ओपेक का एक विस्तारित गठबंधन है, जिसमें ओपेक के मूल सदस्यों के साथ-साथ 10 अन्य गैर-ओपेक तेल उत्पादक देश शामिल हैं जो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ओपेक के साथ मिलकर काम करते हैं. ओपेक+ के इन बाहरी सहयोगियों में रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, मैक्सिको, मलेशिया, बहरीन, ब्रुनेई, ओमान, सूडान और दक्षिण सूडान शामिल हैं. 


ओपेक और ओपेक+ का सबसे महत्वपूर्ण काम वैश्विक तेल उत्पादन की मात्रा निर्धारित करना है; जब बाजार में तेल की आपूर्ति अधिक हो जाती है और कीमतें गिरने लगती हैं, तो ये संगठन उत्पादन में कटौती का निर्णय लेते हैं ताकि कीमतों को स्थिर रखा जा सके, और मांग बढ़ने पर ये उत्पादन बढ़ाकर बाजार को संतुलित करते हैं. सरल शब्दों में, यह संगठन वैश्विक तेल अर्थव्यवस्था के 'रेगुलेटर' के रूप में कार्य करता है, जिसका दुनिया भर की ईंधन कीमतों और शेयर बाजारों पर सीधा प्रभाव पड़ता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP