बीमारी खत्म हुई, लेकिन टीबी का दाग नहीं मिटा
छत्तीसगढ़ में DR-TB से मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से अधिक
रायपुर | आयुषी शर्मा : रायपुर के एक बैंक में 29 नवंबर 2025 की सुबह काम सामान्य तरीके से चल रहा था. 27 वर्षीय रौशन सरकार अपने काउंटर पर ग्राहकों का काम निपटा रहे थे. तभी उन्हें अचानक तेज़ और लगातार खाँसी आने लगी. पास बैठे 49 वर्षीय सहकर्मी राकेश उनकी ओर बढ़े ही थे कि उनकी नज़र रौशन के रूमाल पर पड़े खून के धब्बों पर चली गई. घटना कुछ ही सेकंड की थी, लेकिन यहीं से रौशन की ज़िंदगी एक बार फिर बदल गई.
कुछ ही देर में बैंक के भीतर फुसफुसाहट शुरू हो गई. सहकर्मियों के बीच यह बात फैल गई कि रौशन को दोबारा टीबी हो गई है. लोगों की निगाहें बदलने लगीं. जिन लोगों के साथ वे रोज़ काम करते थे, वही अब उनसे दूरी बनाकर रहने लगे. किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर सच क्या है. खून देखकर सभी ने अपने-अपने निष्कर्ष निकाल लिए.
डॉक्टर बताते हैं कि टीबी का इलाज पूरा होने के बाद भी कई मरीजों के फेफड़ों में स्थायी घाव रह जाते हैं. इन घावों से वर्षों बाद भी कभी-कभी खून आ सकता है. इस स्थिति को हेमोप्टाइसिस कहा जाता है. इसका अर्थ यह नहीं होता कि मरीज को दोबारा सक्रिय टीबी हो गई है या वह दूसरों में संक्रमण फैला रहा है. कई मामलों में टीबी के इलाज में इस्तेमाल की गई दवाओं के दुष्प्रभाव भी इसकी वजह बन सकते हैं.
रौशन यह बात जानते थे. उन्होंने अपने सहकर्मियों को समझाने की कोशिश की कि उनका इलाज कई वर्ष पहले पूरा हो चुका है. इस बार खून आने का कारण फेफड़ों को पहले हुई क्षति है, न कि सक्रिय संक्रमण. उन्होंने बार-बार कहा कि उनसे किसी को संक्रमण का खतरा नहीं है.
लेकिन डर और गलतफहमियाँ अक्सर तथ्यों पर भारी पड़ जाते हैं.
किसी ने उनकी बात पर भरोसा नहीं किया. धीरे-धीरे उनके आसपास एक अदृश्य दीवार खड़ी होने लगी. पहले लोगों ने उनके साथ टिफिन खाना बंद कर दिया. फिर बातचीत कम हो गई. कुछ ही दिनों में ऐसा माहौल बन गया कि सहकर्मी उनसे ज़रूरत भर की बात करते और तुरंत अलग हो जाते.
रौशन उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, "हर दिन भीतर घुटन होती थी. मैं सोचता था कि जिस बीमारी से मैं मुक्त हो चुका हूँ, उसी की वजह से मुझे फिर से क्यों परखा जा रहा है."
करीब दस दिन तक यही स्थिति बनी रही. आखिरकार शाखा प्रबंधक ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया. बातचीत के दौरान उन्होंने रौशन को सलाह दी कि वे नौकरी छोड़ दें और इलाज पर ध्यान दें. विडंबना यह थी कि जिस बीमारी के इलाज की बात की जा रही थी, उसका पूरा कोर्स रौशन वर्षों पहले पूरा कर चुके थे.
बहुत से लोगों के लिए टीबी का इलाज खत्म होने का मतलब बीमारी का अंत होता है. लेकिन रौशन सरकार के लिए ऐसा नहीं था. संक्रमण भले ही खत्म हो चुका था, लेकिन उससे जुड़ा सामाजिक कलंक अब भी उनका पीछा कर रहा था.
वे कहते हैं, "मेरे पास यह बात कहने के लिए कोई नहीं था."
टीबी, समाज और संकट
रौशन की कहानी उन हजारों टीबी मरीजों और सर्वाइवर्स की कहानी है, जिनके लिए बीमारी से उबरना ही सबसे बड़ी चुनौती नहीं होती. इलाज पूरा होने के बाद भी उन्हें समाज की शंकाओं, दूरी और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. भारत ने टीबी की पहचान और इलाज के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन बीमारी से जुड़ा सामाजिक कलंक अब भी उतनी ही मजबूती से मौजूद है.
यही कारण है कि कई मरीजों के लिए टीबी केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं रहती. यह अकेलेपन, अस्वीकार किए जाने और मानसिक संघर्ष की लंबी यात्रा बन जाती है. रौशन के जीवन में भी यह संघर्ष केवल बैंक की घटना से शुरू नहीं हुआ था. वर्ष 2023 में उनके पिता का निधन हो गया. परिवार इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि उनकी माँ के स्तन में गांठ पाई गई. जाँच में स्तन कैंसर की पुष्टि हुई. घर की सारी जिम्मेदारियाँ अचानक रौशन के कंधों पर आ गईं. परिवार की आर्थिक और भावनात्मक दोनों जिम्मेदारियाँ अब उन्हीं के पास थीं. ऐसे समय में नौकरी से भी दूर कर दिए जाने की नौबत ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया.
रौशन बताते हैं कि यह पहली बार नहीं था जब टीबी ने उन्हें समाज से अलग-थलग महसूस कराया.
साल 2018 में, जब उनके अधिकांश दोस्त कॉलेज जाते थे और सामान्य जीवन जी रहे थे, तब वे घर के एक अलग कमरे में रहने को मजबूर थे. उन्हें ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (DR-TB) का इलाज चल रहा था. इलाज के वे नौ महीने केवल दवाइयों से लड़ाई के नहीं थे, बल्कि अकेलेपन से भी मुकाबले के थे. धीरे-धीरे दोस्तों के फोन कम होने लगे. मुलाकातें बंद हो गईं. समय बीतने के साथ अधिकांश रिश्ते भी छूटते चले गए.
इलाज के दौरान कई रातें उन्होंने बिना सोए बिताईं. लेकिन उन्हें अपनी बीमारी से अधिक चिंता इस बात की रहती थी कि कहीं उनकी वजह से परिवार का कोई और सदस्य संक्रमित न हो जाए.
वे बताते हैं, "घर में अगर किसी बच्चे को ज़रा-सी भी खाँसी आ जाती थी तो मैं डर जाता था. मुझे लगता था कि कहीं मेरी वजह से किसी और को संक्रमण तो नहीं हो गया."
इलाज पूरा होने के बाद भी यह डर लंबे समय तक उनके भीतर बना रहा. फिर सात साल बाद, बैंक की उस घटना ने जैसे उन सभी पुरानी आशंकाओं को फिर से जगा दिया. उस शाम जब वे घर लौटे, तो उनके मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था कि जिस बीमारी से मैं वर्षों पहले ठीक हो चुका हूँ, उसकी सज़ा मुझे आज भी क्यों मिल रही है?
आज भी रौशन को सिर्फ समाज से शिकायत नहीं है. उन्हें उस स्वास्थ्य व्यवस्था से भी सवाल है जिसने उनकी बीमारी की पहचान करने में कई महीने लगा दिए. उनका मानना है कि अगर समय पर सही जांच और सही इलाज मिला होता, तो शायद उनकी ज़िंदगी का रास्ता कुछ और होता.
रौशन की कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं है. यह उन सवालों की शुरुआत है जो टीबी जैसी बीमारी के इलाज, उसकी पहचान और उससे जुड़े सामाजिक व्यवहार, तीनों पर एक साथ खड़े होते हैं.
सही इलाज में हुई देरी यानी बीमारी खतरनाक
बैंक की घटना के बाद रौशन सरकार के मन में सबसे बड़ा सवाल यही था कि जिस बीमारी से वे वर्षों पहले ठीक हो चुके थे, उसका साया आज भी उनका पीछा क्यों कर रहा है. लेकिन उनकी शिकायत केवल समाज से नहीं है. उन्हें उस स्वास्थ्य व्यवस्था से भी शिकायत है जिसने उनकी बीमारी की सही पहचान करने में महीनों लगा दिए. उनका मानना है कि अगर शुरुआत में ही सही जांच हो जाती, तो शायद उन्हें इतनी कठिन लड़ाई नहीं लड़नी पड़ती.
रौशन बताते हैं कि उनकी परेशानी की शुरुआत वर्ष 2018 में एक सामान्य-सी खाँसी से हुई थी.
शुरुआत में किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह टीबी हो सकती है. डॉक्टरों ने इसे वायरल संक्रमण बताया. दवाइयाँ दी गईं और आराम करने की सलाह दी गई. कुछ दिन तक उन्हें भी लगा कि शायद दवाओं से राहत मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
खाँसी लगातार बनी रही. धीरे-धीरे पूरे शरीर में दर्द रहने लगा. रात में इतना पसीना आता कि कई बार कपड़े भीग जाते. कमजोरी बढ़ती जा रही थी, लेकिन बीमारी की असली वजह अब भी सामने नहीं आ रही थी.
रौशन कहते हैं, "मैं एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास जाता रहा. लगभग तीन से चार महीनों तक बार-बार सलाह बदलती रही, बीमारी की पहचान बदलती रही और इलाज ट्रायल एंड एरर के तरीके से चलता रहा."
उनकी कई तरह की जांचें कराई गईं. ब्रोंकोस्कोपी जैसी महत्वपूर्ण जांच भी हुई, लेकिन तब भी बीमारी की पुष्टि नहीं हो सकी. अलग-अलग एंटीबायोटिक दवाइयाँ दी गईं, पर उनका कोई असर नहीं हुआ.
इस बीच बीमारी लगातार बढ़ती रही. जब तक सही जांच हुई और टीबी की पुष्टि हुई, तब तक संक्रमण सामान्य अवस्था से आगे निकल चुका था.
रौशन को ड्रग-रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (DR-TB) हो चुकी थी.
वे कहते हैं, "जब तक मेरी बीमारी का सही पता चला, तब तक मुझे ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी हो चुकी थी."
DR-TB, टीबी का वह रूप है जिस पर इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो सबसे प्रभावी पहली पंक्ति की दवाएँ, रिफैम्पिसिन और आइसोनियाज़िड, असर नहीं करतीं. ऐसे मरीजों का इलाज सामान्य टीबी की तुलना में कहीं अधिक लंबा, कठिन और जटिल होता है.
रौशन मानते हैं कि उनका अनुभव कोई अपवाद नहीं है. वे कहते हैं, "आज भी छत्तीसगढ़ में टीबी का अच्छा इलाज मिलना एक चुनौती है. समय पर जांच, सही निदान और ट्यूबरकुलोसिस प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट (टीपीटी) जैसी सेवाओं तक सभी की समान पहुँच नहीं है."
उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की चिकित्सा यात्रा नहीं है. यह उस व्यवस्था की भी कहानी है, जहाँ बीमारी की पहचान में हुई कुछ महीनों की देरी किसी मरीज की पूरी ज़िंदगी बदल सकती है. लेकिन टीबी का असर केवल इलाज तक सीमित नहीं रहता. कई बार बीमारी से बड़ा संघर्ष उसके बाद शुरू होता है.
ऐसी ही एक कहानी रायपुर की रहने वाली 23 वर्षीय पुष्पा साहू की है. अप्रैल 2025 में उन्हें पता चला कि वे ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (DR-TB) से संक्रमित हैं. इस एक रिपोर्ट ने उनकी पूरी ज़िंदगी बदल दी. बीमारी की शुरुआत उनके लिए भी मामूली लक्षणों से हुई थी. करीब तीन महीने तक उन्हें लगातार खाँसी आती रही. बुखार बना रहता था और उनका वजन तेजी से कम होने लगा. शुरुआत में उन्होंने इसे मौसम बदलने की वजह से होने वाली सामान्य बीमारी समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया.
लेकिन उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई.
वे बताती हैं, "मैं इतनी कमजोर हो गई थी कि बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो गया था. खाना लगभग बंद हो गया था."
जब वे पूरी तरह बिस्तर पर पड़ गईं, तब उनकी माँ उन्हें सरकारी अस्पताल लेकर गईं. शुरुआती जांच में टीबी की पुष्टि हुई. इसके बाद हुई विस्तृत जांच से पता चला कि यह ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी है, यानी ऐसा संक्रमण जिस पर टीबी की सामान्य दवाएँ असर नहीं करतीं. यह रिपोर्ट आते ही उनकी ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर शुरू हो गया.
टीबी किसी भी मरीज के लिए गंभीर बीमारी है, लेकिन महिलाओं के मामले में यह कई बार सामाजिक संकट भी बन जाती है. विभिन्न अध्ययनों में यह सामने आया है कि टीबी से पीड़ित पुरुषों को अक्सर पत्नी और परिवार का सहयोग मिलता है, जबकि महिला मरीजों को कई बार परिवार का सहारा और सम्मान, दोनों खोने पड़ते हैं.
पुष्पा की कहानी इसी सामाजिक सच्चाई को सामने लाती है.
वे कहती हैं, "मेरे पति का व्यवहार अचानक बदल गया. कुछ दिन बाद उन्होंने कहा कि अब वे मेरी देखभाल नहीं कर सकते."
कुछ ही समय बाद उन्हें मायके भेज दिया गया. बीमारी ने उनसे केवल स्वास्थ्य नहीं छीना, बल्कि उनका वैवाहिक जीवन भी छीन लिया. समाज का व्यवहार भी बदल गया.
पुष्पा बताती हैं, "लोग पहले की तरह घर नहीं आते थे और मुझसे दूरी बनाए रखते थे. ऐसा लगता था जैसे उन्हें लग रहा हो कि हम उनसे पैसों की मदद माँगेंगे."
एक बीमारी ने उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर किया, लेकिन लोगों के बदलते व्यवहार ने मानसिक रूप से भी गहरे घाव दिए.
आज भी उनका इलाज जारी है. उनकी सबसे बड़ी इच्छा केवल इतनी है कि वे पूरी तरह स्वस्थ होकर फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. बातचीत के दौरान उनकी माँ भी पास बैठी थीं. बेटी की बातें सुनते-सुनते उनका गला भर आया. वे कहती हैं, "लड़कियों के बीमार होने से पति छोड़ जाते हैं. इस बीमारी ने मेरी बेटी से बहुत कुछ छीन लिया है. लेकिन मुझे भरोसा है कि एक दिन उसकी ज़िंदगी फिर से सामान्य होगी."
रौशन सरकार और पुष्पा साहू की कहानियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों एक ही सच्चाई की ओर इशारा करती हैं.
टीबी केवल फेफड़ों को प्रभावित करने वाली बीमारी नहीं है. यह रिश्तों की परीक्षा भी लेती है. कई बार नौकरी छिन जाती है, कई बार दोस्त दूर हो जाते हैं और कई बार परिवार भी साथ छोड़ देता है. इसी बीच भारत लगातार टीबी उन्मूलन की दिशा में अपनी उपलब्धियों का दावा कर रहा है. सरकारी अभियान, वार्षिक रिपोर्टें और आँकड़े बताते हैं कि देश ने टीबी नियंत्रण में उल्लेखनीय प्रगति की है.
लेकिन इन उपलब्धियों के पीछे एक ऐसा संकट भी छिपा है, जिस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता. वह संकट है, ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी.
यही बीमारी भारत के लिए सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बनती जा रही है, और इसकी वास्तविक तस्वीर आँकड़ों के भीतर छिपी हुई है.
जब टीबी दवाओं के असर से भी बाहर हो जाए
रौशन सरकार और पुष्पा साहू की कहानियाँ अलग-अलग परिस्थितियों में सामने आती हैं, लेकिन दोनों एक ही बड़ी चुनौती की ओर इशारा करती हैं. यह चुनौती केवल टीबी नहीं है, बल्कि उसका वह रूप है जिसे चिकित्सा विज्ञान में ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (DR-TB) कहा जाता है. यह बीमारी न केवल मरीजों के लिए इलाज को कठिन बना देती है, बल्कि पूरे सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र के सामने गंभीर सवाल भी खड़े करती है.
भारत लंबे समय से टीबी उन्मूलन को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. सरकारी अभियान, जागरूकता कार्यक्रम और सालाना प्रगति रिपोर्टें बताती हैं कि देश ने टीबी नियंत्रण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं. लेकिन इन उपलब्धियों के पीछे एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है, ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी की बढ़ती चुनौती.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ग्लोबल ट्यूबरकुलोसिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनिया भर में जितने लोग मल्टी-ड्रग-रेसिस्टेंट या रिफैम्पिसिन-रेसिस्टेंट टीबी (MDR/RR-TB) से प्रभावित थे, उनमें हर तीन में से एक से अधिक भारत में था. भारत, चीन, फिलीपींस और रूस मिलकर दुनिया के आधे से अधिक ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी मामलों के लिए जिम्मेदार थे.
यह आँकड़ा केवल भारत में मरीजों की संख्या नहीं बताता, बल्कि यह भी दिखाता है कि दुनिया के सबसे बड़े टीबी बोझ वाले देशों में भारत की चुनौती कितनी बड़ी है.
हालाँकि तस्वीर का दूसरा पक्ष उम्मीद भी जगाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार, भारत में टीबी के मामलों में 21 प्रतिशत की कमी आई है. इलाज तक पहुँच भी लगातार बढ़ी है. कुछ वर्षों पहले जहाँ उपचार का दायरा लगभग 53 प्रतिशत था, वहीं अब यह बढ़कर 92 प्रतिशत तक पहुँच गया है. सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है.
लेकिन इन सफलताओं के बावजूद एक चिंताजनक तथ्य सामने आता है. हर वर्ष भारत में लगभग एक लाख ऐसे टीबी मरीज रह जाते हैं, जिनकी बीमारी का कभी पता ही नहीं चल पाता या जिनकी जानकारी राष्ट्रीय कार्यक्रम तक नहीं पहुँचती. ऐसे मरीज इलाज से वंचित रह जाते हैं और अनजाने में संक्रमण समुदाय के भीतर फैलता रहता है.
यही वजह है कि विशेषज्ञ केवल दर्ज मामलों की संख्या को सफलता का पैमाना नहीं मानते. उनके अनुसार, असली चुनौती उन मरीजों तक पहुँचना है जो अब भी स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुँच से बाहर हैं.
ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी इस चुनौती को और गंभीर बना देती है. सामान्य टीबी में जहाँ निर्धारित दवाओं से मरीज के ठीक होने की संभावना अधिक होती है, वहीं DR-TB के मरीजों को लंबा, जटिल और कई बार बेहद तकलीफदेह इलाज कराना पड़ता है. उपचार के दौरान कई दवाएँ एक साथ लेनी पड़ती हैं, जिनके दुष्प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं. इलाज महीनों तक चलता है और कई मरीज बीच में ही दवाएँ छोड़ देते हैं.
जब ऐसा होता है, तो ठीक होने की संभावना कम हो जाती है और दवा-प्रतिरोधी संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है. यही कारण है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ DR-TB को केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ी स्वास्थ्य नीति की चुनौती मानते हैं.
भारत में दुनिया के कुल ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी बोझ का 27 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है. ऐसे में यदि मरीजों की समय पर पहचान नहीं होगी और उन्हें तुरंत सही इलाज नहीं मिलेगा, तो टीबी उन्मूलन का लक्ष्य हासिल करना और कठिन हो जाएगा.
छत्तीसगढ़ का हाल
पहली नज़र में छत्तीसगढ़ की तस्वीर बहुत चिंताजनक नहीं लगती. वर्ष 2024 में यहाँ 369 ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी मरीज दर्ज किए गए. यह संख्या उत्तर प्रदेश के 14,993 मामलों, महाराष्ट्र के 9,226 मामलों, राजस्थान के 4,112 मामलों और पड़ोसी मध्य प्रदेश के 3,361 मामलों की तुलना में काफी कम है.
कागज़ों पर देखें तो ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में DR-TB का बोझ अपेक्षाकृत कम है. लेकिन जब इलाज के नतीजों को देखा जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है.
भारत सरकार के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ में 143 मरीजों ने छोटा ओरल DR-TB उपचार शुरू किया. इनमें से अधिकांश मरीजों ने सफलतापूर्वक इलाज पूरा किया, लेकिन इसी दौरान 26 मरीजों की मौत भी हो गई. इसका अर्थ है कि इलाज शुरू करने वाले हर सौ मरीजों में लगभग 15 मरीज अपनी जान गंवा बैठे.
राष्ट्रीय स्तर पर DR-TB का इलाज करा रहे मरीजों में मृत्यु दर प्रति 100 मरीजों पर लगभग 10 से 13 मौतों के बीच मानी जाती है. यानी छत्तीसगढ़ में यह दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है. आसान शब्दों में कहें तो यदि देशभर में 100 मरीज ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी का इलाज शुरू करते हैं, तो लगभग 87 से 90 मरीज बच जाते हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ में यही संख्या घटकर लगभग 85 रह जाती है.
यह अंतर भले बहुत बड़ा न लगे, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह गंभीर चिंता का विषय है. यह आँकड़े बताते हैं कि राज्य की सबसे बड़ी चुनौती मरीजों की संख्या नहीं, बल्कि इलाज के परिणाम हैं. यानी सवाल यह नहीं है कि कितने मरीज सामने आए. सवाल यह है कि इलाज शुरू होने के बाद उनके साथ क्या हो रहा है. क्या बीमारी का पता बहुत देर से चल रहा है? क्या मरीज इलाज बीच में छोड़ रहे हैं? क्या उन्हें इलाज पूरा करने के लिए पर्याप्त सहयोग मिल रहा है? क्या इलाज के दौरान पोषण, परामर्श और नियमित निगरानी जैसी ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध हैं?
सिर्फ आँकड़ों से इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, लेकिन ये सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था की कई कमजोरियों की ओर संकेत ज़रूर करते हैं. यही वजह है कि विशेषज्ञ अब केवल नए मरीजों की पहचान पर नहीं, बल्कि पूरे उपचार तंत्र की गुणवत्ता पर ज़ोर दे रहे हैं. क्योंकि टीबी से लड़ाई केवल दवा लिख देने से नहीं जीती जा सकती. उसके लिए समय पर जांच, सही निदान, लगातार उपचार, पोषण सहायता, सामाजिक सहयोग और मरीज के साथ निरंतर संपर्क, इन सभी की बराबर ज़रूरत होती है. और जब इनमें से कोई एक कड़ी कमजोर पड़ती है, तो उसका असर सीधे मरीज की ज़िंदगी पर दिखाई देता है. रौशन सरकार और पुष्पा साहू की कहानियाँ इसी सच्चाई को मानवीय चेहरा देती हैं.
उनकी व्यक्तिगत पीड़ा दरअसल उन कमियों का प्रतिबिंब है, जो स्वास्थ्य व्यवस्था के आँकड़ों में अक्सर दिखाई नहीं देतीं.
समाज की लड़ाई
टीबी के खिलाफ लड़ाई सिर्फ दवाओं की नहीं, व्यवस्था और समाज की भी है. विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी के बढ़ते मामलों और इलाज के अपेक्षाकृत खराब नतीजों के पीछे कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है. यह कई ऐसी कमजोरियों का परिणाम है, जो बीमारी की पहचान से लेकर इलाज पूरा होने तक अलग-अलग स्तर पर सामने आती हैं.
छत्तीसगढ़ में काम करने वाले डॉक्टरों के अनुसार, राज्य की भौगोलिक परिस्थितियाँ, गरीबी, कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच इस समस्या को और जटिल बना देती हैं.
रायपुर के जाने-माने चिकित्सक डॉ. अरुण केडिया बताते हैं कि छत्तीसगढ़ मुख्य रूप से आदिवासी आबादी वाला राज्य है. यहाँ बड़ी संख्या में ऐसे समुदाय रहते हैं, जिनकी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अब भी सीमित है. कई गाँव दूर-दराज़ इलाकों में बसे हैं, जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. वे कहते हैं, "छत्तीसगढ़ मुख्य रूप से एक आदिवासी राज्य है और कई आदिवासी समुदायों के पास अभी भी सही स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच नहीं है. अक्सर इसी वजह से टीबी का पता चलने और इलाज शुरू होने में देरी हो जाती है."
उनके अनुसार, राज्य में कुपोषण भी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. कुपोषित व्यक्ति में टीबी होने का खतरा अधिक रहता है और यदि बीमारी का समय पर पता न चले, तो इलाज के परिणाम भी प्रभावित होते हैं. समस्या केवल इतनी नहीं है कि बीमारी देर से सामने आती है. कई मरीज इलाज शुरू होने के बाद भी बीच में दवा लेना बंद कर देते हैं. जैसे ही उन्हें कुछ राहत महसूस होती है, वे मान लेते हैं कि अब बीमारी खत्म हो गई है. जबकि टीबी के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण बात पूरे निर्धारित कोर्स को पूरा करना है. अधूरा इलाज न केवल बीमारी के दोबारा लौटने का खतरा बढ़ाता है, बल्कि दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की संभावना भी बढ़ जाती है.
डॉ. केडिया कहते हैं, "प्रवासी मजदूर भी एक संवेदनशील वर्ग हैं. कई लोग काम पर लौटने लायक ठीक होने के बाद बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं. वे अपनी हालत बिगड़ने पर दोबारा दवा शुरू करते हैं. तब तक कई मामलों में ड्रग-रेसिस्टेंस विकसित हो चुका होता है."
विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजह है कि राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत दवाएँ उपलब्ध होने के बावजूद हर मरीज तक उसका पूरा लाभ नहीं पहुँच पाता.
स्वास्थ्य व्यवस्था का बुनियादी ढाँचा
कुछ क्षेत्रों में दवाओं की नियमित उपलब्धता नहीं रहती. कई जिला अस्पतालों में आवश्यक जाँच सुविधाओं और उपकरणों की कमी है. इससे मरीजों का इलाज बिना रुकावट जारी रखना मुश्किल हो जाता है.
टीबी की पुष्टि होने के बाद भी यह पता लगाना हमेशा आसान नहीं होता कि संक्रमण सामान्य है या ड्रग-रेसिस्टेंट. इसके लिए बलगम के नमूनों को सही तरीके से इकट्ठा करना, सुरक्षित ढंग से प्रयोगशाला तक पहुँचाना और समय पर उनकी जाँच होना बेहद आवश्यक है. यदि नमूने सही तरीके से संरक्षित नहीं किए गए, तो प्रयोगशाला तक पहुँचने से पहले ही बैक्टीरिया नष्ट हो सकते हैं और जाँच के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं.
लेकिन कई बार समस्या इससे भी पहले शुरू हो जाती है. लगातार खाँसी या बुखार होने पर अनेक मरीज सबसे पहले स्थानीय डॉक्टर या सामान्य चिकित्सक के पास जाते हैं. वहाँ अक्सर शुरुआती इलाज वायरल संक्रमण या मौसमी बीमारी मानकर शुरू कर दिया जाता है. दवाओं से कुछ दिनों की राहत मिलने पर मरीज भी निश्चिंत हो जाता है, जबकि बीमारी शरीर के भीतर धीरे-धीरे बढ़ती रहती है.
डॉ. केडिया कहते हैं, "इससे बीमारी छिप जाती है और पता चलने में देरी होती है, जिससे संक्रमण शरीर के अंदर और फैल जाता है."
वे सलाह देते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खाँसी या बुखार बना रहे, तो केवल लक्षणों के आधार पर इलाज कराने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. उनके शब्दों में, "जब तक कई मरीज सही डॉक्टर तक पहुँचते हैं, तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है."
जाँच व्यवस्था में कमियाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर भी दिखाई देती हैं. कई स्थानों पर ध्यान केवल दवाइयाँ उपलब्ध कराने तक सीमित रहता है, जबकि समय पर बलगम का नमूना लेना, उसे जाँच के लिए प्रयोगशाला भेजना और आवश्यकता पड़ने पर बड़े चिकित्सा केंद्रों तक रेफर करना भी उतना ही आवश्यक है. डॉ. केडिया मानते हैं कि सबसे बड़ी कमी बीमारी का जल्दी और सही पता न चल पाना है.
हालाँकि सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि इलाज के खराब नतीजों के लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. देर से बीमारी का पता चलना, इलाज में रुकावट, कुपोषण, दूसरी बीमारियाँ, आर्थिक कठिनाइयाँ और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच, ये सभी कारण मिलकर स्थिति को जटिल बना देते हैं. विशेष रूप से दूर-दराज़ और आदिवासी इलाकों में रहने वाले मरीजों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो जाती है.
इलाज पर भारी दूरी
छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिलों, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा, में रहने वाले अनेक लोगों के लिए टीबी के खिलाफ लड़ाई अस्पताल पहुँचने से पहले ही शुरू हो जाती है. इन इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र अक्सर गाँवों से काफी दूर हैं, जबकि विशेषज्ञ सेवाएँ केवल बड़े अस्पतालों में उपलब्ध होती हैं. कई मरीजों को जंगलों, कच्ची सड़कों और लंबी दूरी तय करके प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचना पड़ता है.
जो परिवार पहले से आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हों, उनके लिए अस्पताल का हर चक्कर अतिरिक्त खर्च लेकर आता है. कई बार पूरे दिन की मजदूरी छूट जाती है. ऐसे में बार-बार अस्पताल जाना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है. नतीजा यह होता है कि अनेक मरीजों को इलाज और रोज़ी-रोटी के बीच चुनाव करना पड़ता है. इसी कारण इलाज कई बार बीच में छूट जाता है.
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि टीबी, खासकर ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी के मामलों में इलाज में ऐसी रुकावटें जानलेवा साबित हो सकती हैं. देर से पहचान और अनियमित उपचार न केवल मरीज के ठीक होने की संभावना कम करते हैं, बल्कि संक्रमण के समुदाय में फैलने का जोखिम भी बढ़ा देते हैं. गरीबी, कुपोषण और दूसरी बीमारियाँ इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं. परिणाम यह होता है कि अनेक मरीज तब अस्पताल पहुँचते हैं, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है.
यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनौती केवल अधिक से अधिक मरीजों की पहचान करने की नहीं है. असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि दूर-दराज़ और आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय पर जाँच, सही निदान, लगातार इलाज और उपचार के बाद आवश्यक फॉलो-अप देखभाल भी मिल सके. केवल मामलों की संख्या कम कर देना पर्याप्त नहीं होगा, यदि मरीज इसलिए जान गंवाते रहें क्योंकि बीमारी का पता बहुत देर से चला या वे इलाज पूरा नहीं कर पाए.
रौशन सरकार आज भी कहते हैं कि इलाज पूरा होने के सात साल बाद भी टीबी का साया उनके साथ है. संक्रमण उनके शरीर से जा चुका है, लेकिन बीमारी से जुड़ा कलंक अब भी उनके जीवन का हिस्सा बना हुआ है.
उनकी कहानी याद दिलाती है कि अनेक मरीजों के लिए ठीक होने का अर्थ केवल आखिरी दवा खा लेना या नेगेटिव रिपोर्ट मिल जाना नहीं होता. उसके बाद भी उन्हें कार्यस्थल पर सहकर्मियों की दूरी, टूटते रिश्तों और समाज की गलत धारणाओं का सामना करना पड़ता है. भारत टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल बीमारी का इलाज पर्याप्त नहीं होगा.
ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी पर नियंत्रण के लिए समय पर पहचान, बिना रुकावट इलाज, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और सभी तक समान स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी उस सामाजिक कलंक को समाप्त करना भी है, जो इलाज पूरा होने के वर्षों बाद तक मरीजों का पीछा नहीं छोड़ता. रौशन सरकार जैसे लोगों के लिए टीबी के खिलाफ लड़ाई दवाओं के साथ खत्म नहीं हुई. बस उसका स्वरूप बदल गया.