'लड़का-लड़की भागें तो राज्य क्या करे?' पॉक्सो के दुरुपयोग पर SC
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने किशोरों के प्रेम संबंधों में पॉक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है. एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि कोई राज्य किसी लड़के और लड़की को भागने (एलोपमेंट) से कैसे रोक सकता है?
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि 15 से 18 साल की उम्र संवेदनशील और प्रयोगों की होती है. ऐसे में जब किशोर अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में आगे बढ़ते हैं और घर से भाग जाते हैं, तो माता-पिता अक्सर अपने तथाकथित 'सम्मान' की रक्षा के लिए इसे आपराधिक रंग दे देते हैं. अदालत ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे मामलों को वास्तव में पॉक्सो के तहत यौन उत्पीड़न का मामला माना जाना चाहिए?
यह पूरी बहस किशोरों की निजता के अधिकार से जुड़े एक स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) मामले की सुनवाई के दौरान हुई. यह मामला कलकत्ता हाईकोर्ट के 2023 के उस विवादित फैसले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें किशोरियों को अपने 'यौन आवेगों पर नियंत्रण' रखने की सलाह दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में ही हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था.
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात आई कि एक नाबालिग लड़की एक 25 वर्षीय युवक के साथ चली गई थी, जिससे उसका एक बच्चा भी है और वे अब साथ में खुश हैं. इसके बावजूद युवक को पॉक्सो के तहत जेल भेज दिया गया था. अदालत ने इस पर टिप्पणी की कि जब 2012 में सहमति की उम्र 16 से बढ़ाकर 18 वर्ष की गई, तभी से ऐसे मामले अवैध श्रेणी में आ गए, जबकि जमीनी हकीकत में किशोरों के बीच ऐसे संबंध पहले भी बनते थे.
वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि एक समिति की रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ है कि पॉक्सो मामलों में व्यवस्था (सिस्टम) पूरी तरह विफल साबित हो रही है. उन्होंने पॉक्सो मामलों की निगरानी के लिए एक डिजिटल डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया.
वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि इस संबंध में कुछ सिफारिशें तैयार की गई हैं, जिन्हें राज्यों में लागू किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई तय करते हुए निर्देश दिया है कि जो भी गाइडलाइंस बनें, वे व्यावहारिक होनी चाहिए.