'दक्षिण पार्स' तथा 'रास लफान' पर हमले का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
दोहा/तेहरान । डेस्क: मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है जहां वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह चरमराने की कगार पर है. बुधवार को इजरायल द्वारा ईरान के 'दक्षिण पार्स' गैस क्षेत्र पर किए गए हमले और उसके जवाब में गुरुवार तड़के ईरान द्वारा कतर के 'रास लफान' एलएनजी (LNG) संयंत्र को निशाना बनाए जाने से दुनिया भर के बाजारों में हड़कंप मच गया है.
इन दो प्रमुख केंद्रों पर हुए हमलों का असर केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरी दुनिया के लिए एक भीषण ऊर्जा संकट की नींव रख दी है.
दक्षिण पार्स दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है जिसे ईरान और कतर साझा करते हैं. हालांकि दक्षिण पार्स पर हमले का तात्कालिक असर ईरान की घरेलू बिजली और हीटिंग व्यवस्था पर पड़ेगा, क्योंकि ईरान अपनी 80 प्रतिशत गैस जरूरतों के लिए इसी पर निर्भर है, लेकिन इसका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव इराक जैसे देशों में बिजली संकट के रूप में पहले ही दिखने लगा है. असली वैश्विक खतरा कतर के 'रास लफान' परिसर पर हुए मिसाइल हमलों से पैदा हुआ है.
रास लफान दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी उत्पादन केंद्र है, जो वैश्विक एलएनजी आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले संभालता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस संयंत्र को पहुंची व्यापक क्षति के कारण अब वैश्विक गैस बाजार में आपूर्ति बहाल होने में हफ्तों नहीं बल्कि कई महीने लग सकते हैं. इसका सबसे सीधा और विनाशकारी असर यूरोप पर पड़ेगा, जो यूक्रेन युद्ध के बाद से रूसी गैस के विकल्प के रूप में कतरी एलएनजी पर अत्यधिक निर्भर हो गया है.
रास लफान में उत्पादन ठप होने और बुनियादी ढांचे के नष्ट होने से यूरोप में गैस की थोक कीमतें पहले ही 13 यूरो से अधिक बढ़कर 68.03 यूरो प्रति मेगावाट घंटा तक पहुंच गई हैं. यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो यूरोप में सर्दियों के दौरान हीटिंग का संकट पैदा हो सकता है और औद्योगिक उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा.
इसके अलावा, जापान, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े एशियाई आयातक, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कतर पर निर्भर हैं, उन्हें अब भारी किल्लत और असहनीय कीमतों का सामना करना पड़ेगा.
रास लफान और दक्षिण पार्स पर हुए इन हमलों ने वैश्विक महंगाई को बढ़ाने का नया चक्र शुरू कर दिया है, जिससे न केवल विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएं डगमगाएंगी, बल्कि ग्लोबल साउथ के गरीब देश, जो महंगी ऊर्जा खरीदने में सक्षम नहीं हैं, पूरी तरह आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकते हैं. संक्षेप में, इन हमलों ने दुनिया को एक ऐसे युग में धकेल दिया है जहां ऊर्जा की कमी और आसमान छूती कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 'न्यू नॉर्मल' बन सकती हैं.
कतरी गैस की कमी से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले प्रमुख देशों का आर्थिक विश्लेषण
दोहा के रास लफान परिसर पर हुए हमलों और उसके परिणामस्वरूप उत्पादन ठप होने से दुनिया के कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं सीधे तौर पर खतरे में पड़ गई हैं. कतर वैश्विक एलएनजी (LNG) आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करता है, इसलिए इस आपूर्ति श्रृंखला में आई किसी भी बाधा का सबसे गहरा और तत्काल प्रभाव चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों पर पड़ेगा. ये देश अपनी बिजली उत्पादन और औद्योगिक ईंधनों के लिए कतरी गैस के सबसे बड़े खरीदार हैं.
उदाहरण के लिए, भारत अपनी कुल एलएनजी आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा अकेले कतर से प्राप्त करता है, जिसका अर्थ है कि रास लफान में उत्पादन रुकने से भारत में उर्वरक कारखाने, बिजली संयंत्र और सीएनजी परिवहन व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी, जिससे देश में खाद्य और परिवहन लागत में भारी वृद्धि होने की आशंका है.
इसी तरह, चीन और जापान जैसे बड़े विनिर्माण केंद्र, जो स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए गैस पर अत्यधिक निर्भर हैं, उन्हें अब वैश्विक बाजार में कहीं अधिक ऊंची कीमतों पर वैकल्पिक स्रोत खोजने होंगे, जो उनकी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर देगा.
एशिया के अलावा, यूरोपीय देशों के लिए यह संकट अस्तित्व की लड़ाई जैसा है. रूस-यूक्रेन युद्ध और नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइनों के विनाश के बाद से जर्मनी, इटली और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए कतर की ओर देख रहे थे. जर्मनी ने हाल के वर्षों में कतर के साथ लंबी अवधि के कई समझौते किए थे ताकि वह अपनी सर्दियों की हीटिंग जरूरतों को पूरा कर सके.
रास लफान पर हुए हमले और नई परियोजनाओं (नॉर्थ फील्ड ईस्ट और साउथ) के विस्तार में होने वाली देरी का सीधा मतलब है कि यूरोप को अब अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया से बहुत महंगी दरों पर गैस मंगवानी होगी. इससे यूरोप में पहले से ही जारी महंगाई और अधिक बढ़ेगी और सर्दियों के मौसम में वहां बिजली कटौती या उद्योगों को बंद करने जैसी नौबत आ सकती है.
इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे विकासशील देश, जो पहले से ही विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहे हैं, इस आपूर्ति संकट से सबसे बुरी तरह टूट सकते हैं.
ये देश महंगी 'स्पॉट मार्केट' कीमतों पर गैस खरीदने में असमर्थ होंगे, जिससे वहां बड़े पैमाने पर बिजली संकट (ब्लैकआउट) पैदा होगा और उनकी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह पटरी से उतर सकती हैं. कुल मिलाकर, कतरी गैस की कमी एक वैश्विक 'डोमिनो इफेक्ट' पैदा करेगी, जहां एक देश की ऊर्जा किल्लत दूसरे देश की महंगाई और वैश्विक मंदी का कारण बनेगी.