जो बंगाल जीत लेगा, मुकद्दर का सिकंदर कहलायेगा
जेके कर
देश के पांच राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव पूरे हो गये हैं अब केवल नतीजों का इंतजार है. यूं तो चुनाव असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी तथा केरल में हो रहें हैं लेकिन सबकी नज़र पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर लगी हुई है. पश्चिम बंगाल का चुनाव इसलिये सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकिं इसका नतीजा देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है. पश्चिम बंगाल में इस बार मतदान का प्रतिशत, आजादी के बाद से सबसे ज्यादा हुआ है जिससे इसकी महत्ता साबित हो रही है.
वैसे केरल के चुनाव पर भी सबकी नज़र है. क्या लेफ्ट फ्रंट यहां अपनी आखिरी संसदीय गढ़ को बचा पायेगा या नहीं. यदि केरल में लेफ्ट फ्रंट जीत जाता है तो वह भी एक धमाकेदार खबर बन जायेगी तथा इससे लेफ्ट की डूबती हुई कश्ती फिर से लहरों के उपर आ जायेगी. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट को लेकर कोई उम्मीद की किरण नज़र नहीं आ पा रही है. वहां पर इसे टीएमसी व भाजपा के समर्थक वोट काटने वाली पार्टी मान रहें हैं.
असम, तमिलनाडु तथा पुडुचेरी के नतीजें चौंकाने वाले नहीं होने जा रहें हैं. इससे देश की राजनीति पर कोई अलग से प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है.
हमने बात की शुरूआत पश्चिम बंगाल के चुनाव से की थी. यहां पर दांव पर है प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिष्ठा तथा तृणमूल कांग्रेस की 'शेरनी' ममता बनर्जी का जुझारूपन. भाजपा भी सबसे ज्यादा जोर बंगाल चुनाव पर ही लगी रही है.
वैसे, भाजपा, हर चुनाव को पूरी गंभीरता तथा तन्मयता के साथ लड़ती है फिर भी इस बार पश्चिम बंगाल की बात और है. भाजपा ने मुख्यमंत्री का कोई चेहरा सामने नहीं रखा है तथा दावा किया है कि सभी 294 विधानसभा सीटों पर मोदी जी ही चुनाव लड़ रहें हैं. इसी कारण से तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ'ब्रायन ने चुनौती दी है कि क्या यदि 4 मई को नतीजा भाजपा के खिलाफ जाता है तो क्या प्रधानमंत्री मोदी जी इस्तीफा दे देंगे.
छपते समाचारों से स्पष्ट है कि चुनाव आयोग भी इस बार पश्चिम बंगाल पर विशेष ध्यान दे रहा है. चुनाव घोषणा होने के बाद वहां के मुख्य सचिव तथा डीजीपी को उनके पद से हटा दिया गया. अर्धसैनिक बल तथा केन्द्रीय पुलिस बल के इतने जवान तैनात किये गये हैं कि उन्हें प्रति 100-150 जनसंख्या पर 1 की तैनाती माना जा रहा है. सुरक्षाबलों की इतनी तैनाती क्या मणिपुर या कश्मीर में भी है यह विवेचना का विषय है.
भाजपा ने अपने देशभर के कार्यकर्ताओं तथा नेताओं की फौज बंगाल में झोंक दी है. राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पहले से ही हिन्दू मतों की ध्रुवीकरण में लगा हुआ है. भाजपा ने भी दावा किया है कि बंगलादेश से मुसलमानों को लाकर ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल का डेमोग्राफी या जनसांख्यिकी को बदल देना चाहती है. ममता बनर्जी पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह बंगलादेश से बंगाली मुसलमानों को लाकर चुनाव जीतती है.
इस बार SIR के माध्यम से पश्चिम बंगाल में तकरीबन 91 लाख नाम काटे गये हैं. SIR को लेकर ममता बनर्जी ने जितना हो-हल्ला मचाया उतना देश में कहीं पर भी नहीं देखा गया है. मामलें को सर्वोच्य न्यायलय तक ले जाया गया है. पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर एक आतंक फैल गया है. मतदान के पहले तक बंगाल में मतदाता सूची पर काम चलता रहा.
गौर करने वाली बात है कि ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में साल 2011 में लेफ्ट फ्रेंट को सत्ता से हटाने का असंभव कार्य कर दिखाया था. लेफ्ट फ्रंट तीन दशकों से ज्यादा पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ रही. बंगाल के भरोसे ही तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु का नाम प्रधानमंत्री पद के लिये आया था. लेकिन बंगाल व केरल के नेताओं के विरोध के कारण ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके. ज्योति बसु ने इसे 'ऐतिहासिक भूल' करार दिया था. जो बाद में सही साबित हुआ. यदि उस समय प्रधानमंत्री के पद को मान लिया जाता तो देश में वामपंथ की इतनी दुर्दशा नहीं होती.
खैर, बात ममता बनर्जी की हो रही थी. इसका उल्लेख इसलिये जरूरी था कि ममता ने उस असंभव से लगने वाले वामपंथ के दुर्ग को ढहाने में कामयाब हुई जिसे उनके पहले कोई नहीं कर सका था. आज, वहीं ममता बनर्जी को अपना दुर्ग बचाने के लिये संघर्ष करना पड़ रहा है. उसका पाला इस बार भाजपा से पड़ा है. जो राजनीति के साम-दाम-दंड-भेद की नीति में माहिर है. कई राज्यों में भाजपा की संख्या कम होने पर भी 'ऑपरेशन लोटस' के माध्यम से भाजपा सत्तारूढ़ हो चुकी है.
वैसे जरूरत पड़ने पर भाजपा पश्चिम बंगाल में भी इस बार 'ऑपरेशन लोटस' को अंजाम देने से पीछे नहीं हटेगी. जाहिर है कि इसके लिये 'फाइलें' तैयार हो चुकी होंगी. भाजपा बंगाल के जंग को किसी भी तरह से हारने के मूड में नहीं है.
ममता बनर्जी ने जिस आसानी से 'बंगाली भद्र पुरूष' बुद्धदेव भट्टाचार्या को सत्ता से हटा दिया था इस बार भाजपा से अपनी सत्ता बचा ले जाना उतना ही कठिन कार्य है. तृणमूल कांग्रेस भी पूरा जोर लगा रही है कि उसकी सत्ता बरकरार रहें.
आखिरकार, 4 मई को जब नतीजें आयेंगे तब पता चलेगा कि अविश्वसनीय लगने वाले लेफ्ट के दुर्ग को ढहाने वाली ममता बनर्जी अपनी कुर्सी बचा पाती है या नहीं. यदि तृणमूल कांग्रेस जीत जाती है तो ममता बनर्जी का नाम दुनियाभर के समाचार-पत्र की हेडिंग बन सकता है. और यदि हार जाती है तो उसे अपनी पार्टी को संभालना मुश्किल हो जायेगा.
यदि, भाजपा पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत जाती है को मानना पड़ेगा कि भारत में उसके अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को रोकना हर किसी के बस की बात नहीं है. इसी कारण से कहा जा रहा है कि जो बंगाल का चुनाव जीत जायेगा वो मुकद्दर का सिकंदर हो जायेगा.