'वाशिंगटन की मानसिकता- संसाधन लूटना तथा प्रतिद्वंद्वियों को कुचलना'
बीजिंग । डेस्क: चीन के चाइना पीपल्स डेली के हवाले से खबर है कि मध्य पूर्व में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य हमलों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान इस अशांत क्षेत्र की ओर खींच लिया है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस खूनी संघर्ष के अंत की उम्मीद कर रहा है, लेकिन असल सवाल युद्ध के पीछे छिपे उन इरादों का है जो वाशिंगटन की सत्ता के गलियारों से संचालित हो रहे हैं. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीफन वॉल्ट ने इसे 'शिकारी आधिपत्य' (Predatory Hegemony) का नाम दिया है. यह मानसिकता किसी नियम या नैतिकता से नहीं, बल्कि केवल संसाधनों को लूटने और अपने प्रतिद्वंद्वियों को कुचलने के आदिम जुनून से प्रेरित है.
शिकारी आधिपत्य: दोस्तों और दुश्मनों का समान शोषण
अमेरिका की वर्तमान विदेश नीति का सबसे वीभत्स चेहरा यह है कि वह अब अपने सहयोगियों और विरोधियों के बीच फर्क करना भूल गया है. 'शिकारी आधिपत्य' के तहत वाशिंगटन अपनी विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति का उपयोग केवल रियायतें और समर्पण वसूलने के लिए कर रहा है. आज अमेरिका के लिए हर रिश्ता एक 'जीरो-सम गेम' बन चुका है, जहां उसकी जीत तभी सुनिश्चित होती है जब सामने वाला सब कुछ खो दे. उसकी नीति का मूल आधार अब यह बन गया है कि "जो मेरा है वह मेरा है, और जो तुम्हारा है, उसे मैं छीन सकता हूँ." यह व्यवहार किसी वैश्विक नेता का नहीं, बल्कि एक ऐसे शिकारी का है जो केवल अपने लाभ के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बंधक बना रहा है.
अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां और 'जंगल राज' की वापसी
वाशिंगटन ने बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय समझौतों से हाथ खींचे हैं और वैश्विक जिम्मेदारियों का परित्याग किया है, उसने उसकी असलियत को उजागर कर दिया है. अमेरिका आज अंतरराष्ट्रीय कानूनों को एक 'बुफे' की तरह इस्तेमाल कर रहा है जो नियम उसके हितों को साधते हैं, उन्हें वह दूसरों पर थोपता है, और जो उसके आक्रामक कदमों में बाधा बनते हैं, उन्हें वह कूड़ेदान में डाल देता है. व्यापार युद्ध, टैरिफ का हथियार के रूप में इस्तेमाल और संप्रभु देशों के संसाधनों पर कब्जा करने के लिए सैन्य बल का प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अब 'नियम आधारित व्यवस्था' से हटकर 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाले दौर में लौट रहा है.
सत्ता खोने का डर और घटती आर्थिक ताकत की हताशा
इस आक्रामक व्यवहार के पीछे अमेरिका का वह डर है जो उसकी घटती आर्थिक हिस्सेदारी से पैदा हुआ है. 1960 के दशक में वैश्विक जीडीपी में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत थी, जो 2023 तक गिरकर महज 25 प्रतिशत रह गई है. इस सापेक्ष गिरावट ने वाशिंगटन के नीति-निर्धारकों के भीतर एक गहरी चिंता और हताशा पैदा कर दी है. आर्थिक वैश्वीकरण और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के सामूहिक उदय को अमेरिका अपनी सत्ता के लिए खतरे के रूप में देख रहा है. यही कारण है कि वह अब सहयोग के बजाय विनाशकारी मानसिकता अपना रहा है ताकि किसी भी तरह अपने ढलते सूरज को रोक सके.
सहयोगियों का मोहभंग और अमेरिका का आत्म-अलगाव
अमेरिका की इस 'शिकारी' मानसिकता का सबसे बड़ा नुकसान उसे खुद झेलना पड़ रहा है. जब कोई महाशक्ति केवल अपना फायदा देखेगी, तो उसके सहयोगी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगेंगे. आज यूरोप से लेकर एशिया तक, अमेरिका के पुराने दोस्त भी अब 'रणनीतिक स्वायत्तता' की बात कर रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि कब वाशिंगटन उन्हें ही अपने शिकार के रूप में चुन ले. 2025 के गैलप सर्वे के आंकड़े गवाह हैं कि नाटो सहयोगियों सहित दुनिया के 44 देशों में अमेरिकी नेतृत्व की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है. अमेरिका आज दुनिया में नेतृत्व नहीं कर रहा, बल्कि अपनी दादागिरी से खुद को अलग-थलग कर रहा है.
19वीं सदी की सोच और 21वीं सदी की हकीकत
द नेशनल इंटरेस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन आज भी 19वीं सदी की उस सोच में कैद है जहां क्षेत्र कब्जाना, संसाधन लूटना और विरोधियों को पूरी तरह कुचल देना ही शक्ति का पैमाना माना जाता था. लेकिन 21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया अब इस तरह के एकतरफा दबदबे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. आज की दुनिया को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो समावेशी विकास और 'विन-विन' सहयोग की बात करे. अमेरिका की यह 'पीछे की ओर दौड़' उसे आधुनिक दुनिया से काट रही है.
विनाश की ओर बढ़ता कदम
प्रोफेसर स्टीफन वॉल्ट का यह निष्कर्ष बिल्कुल सटीक बैठता है कि 'शिकारी आधिपत्य' अपने विनाश के बीज खुद बोता है. वाशिंगटन की यह मानसिकता कि वह संसाधनों को लूटकर और प्रतिद्वंद्वियों को डराकर लंबे समय तक राज कर सकता है, एक भ्रम मात्र है. अल्पकाल में सैन्य हमलों या आर्थिक प्रतिबंधों से कुछ लाभ मिल सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह नीति अमेरिका को कम सुरक्षित, कम समृद्ध और प्रभावहीन बना देगी. जब तक वाशिंगटन इस 'शिकारी' चश्मे को उतारकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षवाद को नहीं अपनाता, वह इसी तरह संघर्षों की आग भड़काता रहेगा और अंततः खुद भी उसी में झुलस जाएगा.