युद्ध और महंगाई ने तोड़ी कमर, क्या दिवालिया होने वाला है ईरान?
नई दिल्ली । डेस्क: युद्ध की विभीषिका झेल रहे ईरान के लिए नया साल तबाही का पैगाम लेकर आया है. कभी 'पर्शिया' की शान रखने वाला यह देश आज अपनी अर्थव्यवस्था के सबसे काले दौर से गुजर रहा है. पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष और अमेरिकी प्रतिबंधों के दोहरे वार ने ईरान को आर्थिक रूप से 'रक्तहीन' कर दिया है.
ताजा आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, ईरान न केवल भीषण महंगाई और बेरोजगारी की मार झेल रहा है, बल्कि अब उसके दिवालिया होने का खतरा भी मंडराने लगा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पांच सप्ताह के संघर्ष के बाद अस्थायी युद्धविराम की घोषणा तो कर दी गई है, लेकिन ईरान के भीतर की स्थिति अब भी 'अग्निगर्भ' बनी हुई है. खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण ईंधन संकट गहरा गया है और ओमान की खाड़ी व फारस की खाड़ी के बीच के संकीर्ण समुद्री रास्ते पर ईरानी अर्धसैनिक बल 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का कड़ा नियंत्रण है.
अमेरिका को 'सबक' सिखाने की होड़ में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध तो किया, लेकिन इसकी भारी कीमत उसकी अपनी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ रही है. आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य मोर्चे पर प्रतिरोध दिखाने वाला तेहरान अंदर ही अंदर खोखला हो चुका है.
पश्चिमी मीडिया और यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्टों के अनुसार, दो सप्ताह का युद्धविराम भी ईरान को राहत देने में नाकाम रहा है. उत्पादन और निर्यात ठप होने से सरकारी खजाना खाली है. युद्ध के कारण आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तीन गुना तक बढ़ गई हैं.
ईरानी मुद्रा 'रियाल' इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है. वर्तमान में एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रियाल की कीमत 11 लाख से 13 लाख के बीच झूल रही है, जिससे आम जनता की जीवन भर की जमा पूंजी रद्दी के टुकड़े में बदल गई है. खाद्य मुद्रास्फीति 70 से 100 प्रतिशत के बीच पहुंच गई है, जिससे ब्रेड, दूध और दवाओं जैसी बुनियादी चीजों के लिए लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है.
ईरान की इस दुर्दशा के पीछे अमेरिकी और इजरायली हमले भी प्रमुख कारण हैं. संघर्ष के दौरान ईरान के सबसे पुराने बैंक, तेल रिफाइनरियों और दक्षिण पार्स जैसे गैस क्षेत्रों को निशाना बनाया गया, जिससे देश की आय का मुख्य स्रोत ही ध्वस्त हो गया. स्थिति इतनी विकट है कि देश की लगभग 57 प्रतिशत आबादी कुपोषण का शिकार है.
बेरोजगारी दर में बेतहाशा वृद्धि ने सरकार के खिलाफ जन आक्रोश को फिर से भड़का दिया है. मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए सेंट्रल बैंक ऑफ ईरान ने एक करोड़ रियाल का नया नोट जारी किया है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत मात्र 7 डॉलर के बराबर है.
युद्ध की मानवीय कीमत भी भयावह रही है. फरवरी के अंत से अब तक कम से कम 1,937 लोगों की जान जा चुकी है और 24,800 से अधिक घायल हुए हैं. इस्पात कारखाने और बिजली संयंत्र बंद होने से हजारों मजदूर सड़क पर आ गए हैं.
हालांकि ईरान ने सस्ते 'शाहिद-136' ड्रोन और मिसाइलों के जरिए युद्ध में टिके रहने की कोशिश की, लेकिन आंतरिक मोर्चे पर वह भूख और विद्रोह की दोहरी चुनौती से हारता दिख रहा है.
प्रशासन के करीबी सूत्रों का मानना है कि अगर अमेरिकी प्रतिबंध जल्द नहीं हटाए गए, तो ईरान को पूर्ण आर्थिक पतन और गृहयुद्ध जैसी स्थिति से बचाना नामुमकिन होगा. तेहरान आज अपने इतिहास के सबसे कठिन मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ युद्ध का मैदान है और दूसरी तरफ दिवालिया होने का डर.