केन्या में US इबोला क्वारंटाइन सेंटर का हिंसक विरोध
नैरोबी । डेस्क: पूर्वी अफ्रीकी देश केन्या में इस समय अमेरिकी नागरिकों के लिए बनाए जा रहे एक इबोला क्वारंटाइन सेंटर को लेकर देशव्यापी आक्रोश फैल गया है. यह विवाद तब और गहरा गया जब सेंट्रल केन्या के नानयुकी शहर में इसके खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया. स्थानीय मीडिया और अधिकारियों के अनुसार, नानयुकी में लापिकिया एयर बेस के बाहर जुटे प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हुई झड़प में कम से कम दो लोगों की जान चली गई है, जबकि एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुआ है.
यह पूरा विवाद उस समय सामने आया है जब पड़ोसी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) में इबोला के एक दुर्लभ और बेहद खतरनाक स्ट्रेन का प्रकोप तेजी से फैल रहा है.
क्या है पूरा विवाद और क्यों भड़के हैं केन्याई नागरिक:
दरअसल, अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में पुष्टि की थी कि विदेशों में इबोला वायरस के संपर्क में आने वाले या संक्रमित होने वाले अमेरिकी नागरिकों को इलाज के लिए वापस अमेरिका ले जाने के बजाय, केन्या के सैन्य ठिकाने पर बनाए जा रहे इस केंद्र में रखा जाएगा.
इस फैसले के बाद से ही केन्या की जनता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि अमेरिका अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए केन्या को एक 'कंटेनमेंट कॉलोनी' या कचरा पात्र की तरह इस्तेमाल कर रहा है.
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस कदम से केन्या में इबोला वायरस के आयात होने का खतरा बेहद बढ़ जाएगा, जबकि देश में अब तक इबोला का एक भी मामला सामने नहीं आया है.
मेडिकल एसोसिएशन और नागरिक समाज ने उठाए गंभीर सवाल:
केन्या के डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के सबसे बड़े संगठन 'केन्या मेडिकल प्रैक्टिशनर्स, फार्मासिस्ट्स एंड डेंटिस्ट्स यूनियन' ने इस परियोजना का कड़ा विरोध किया है. यूनियन ने एक कड़े बयान में कहा कि वे केन्या को किसी महाशक्ति की कॉलोनी नहीं बनने देंगे.
उनका सीधा तर्क है कि अगर यह वायरस अमेरिका के लिए इतना खतरनाक है कि वह अपने मरीजों को अपनी धरती पर नहीं रखना चाहता, तो यह केन्या के नागरिकों के लिए भी उतना ही घातक है.
इस बीच, कतीबा इंस्टीट्यूट और केन्या लॉ सोसायटी ने इस निर्माण के खिलाफ नैरोबी के उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्माण कार्य और मरीजों के आने पर फिलहाल रोक लगा दी है.
बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का खौफ और अमेरिकी फंडिंग में कटौती:
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में कांगो में मिले इबोला के 'बुंडिबुग्यो' स्ट्रेन के कारण अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है. इस स्ट्रेन की सबसे चिंताजनक बात यह है कि आम ज़ायरे स्ट्रेन के विपरीत, इसके लिए वर्तमान में कोई स्वीकृत टीका या पुख्ता इलाज उपलब्ध नहीं है.
यह बीमारी अब युगांडा तक पहुंच चुकी है, जहां अब तक मौतें और कई मामलों की पुष्टि हुई है.
जानकारों का कहना है कि पूर्व में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा अमेरिकी विदेशी सहायता और 'यूएसएआईडी' के बजट में की गई भारी कटौती के कारण इस महामारी से लड़ना और मुश्किल हो गया है. इसी फंड की कमी के बीच अमेरिका ने अफ्रीका के साथ कुछ विवादित समझौते किए हैं, जिसके तहत स्वास्थ्य डेटा के बदले वित्तीय मदद दी जा रही है.
सरकार के रुख से बढ़ा असमंजस और राजनीतिक तनाव:
अदालत के स्थगन आदेश के बावजूद केन्याई राष्ट्रपति विलियम रुटो ने इस परियोजना का बचाव किया है. राष्ट्रपति रुटो ने कहा कि अमेरिका के साथ केन्या के पुराने और मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, जिसके कारण उन्होंने इस केंद्र को मंजूरी दी थी.
हालांकि, उन्होंने कोर्ट के आदेश पर सीधे तौर पर कुछ भी कहने से परहेज किया.
वहीं दूसरी ओर, देश के स्वास्थ्य मंत्री एडेन बारे दुआले ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि यह केंद्र केवल अमेरिकियों के लिए नहीं बल्कि केन्याई नागरिकों के लिए भी होगा, जिससे भ्रम की स्थिति और बढ़ गई है क्योंकि अमेरिकी अधिकारियों ने इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है.
अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी 'सीडीसी' के भीतर भी विरोध के सुर:
चौंकाने वाली बात यह है कि इस केंद्र को लेकर केवल केन्या में ही नहीं, बल्कि खुद अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली के भीतर भी असंतोष है. अमेरिकी रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अधिकारियों ने इस योजना की आलोचना की है.
आंतरिक सूत्रों के अनुसार, विशेषज्ञों का मानना है कि मरीजों का इलाज अमेरिका के भीतर होना ज्यादा बेहतर और सुरक्षित होता है.
इस योजना के कारण भविष्य में महामारी से लड़ने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि कोई भी स्वास्थ्य कर्मी अपने देश से दूर ऐसे जोखिम भरे केंद्र में स्वेच्छा से काम नहीं करना चाहेगा.
फिलहाल कोर्ट की रोक के बाद भी इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सामाजिक रार जारी है.