US ने ईरान में डालर की कमी पैदा करके असंतोष को बढ़ावा दिया
वाशिंगटन । डेस्क: अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के हालिया बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि वाशिंगटन ने ईरान की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने के लिए जानबूझकर 'डॉलर की कमी' पैदा की. बेसेंट ने संसदीय सुनवाई और दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान बेहद बेबाकी से कहा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने एक ऐसी रणनीति बनाई जिससे ईरान के भीतर विदेशी मुद्रा का संकट पैदा हो गया.
उन्होंने दावा किया कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य ईरानी मुद्रा 'रियाल' को पूरी तरह तबाह करना था ताकि बढ़ती महंगाई और आर्थिक तबाही से तंग आकर लोग सड़कों पर उतर आएं और सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दें. बेसेंट के शब्दों में, "हमने ईरान में डॉलर की कमी पैदा की... मुद्रा मुक्त रूप से गिरने लगी, मुद्रास्फीति का विस्फोट हुआ और परिणामस्वरूप ईरानी जनता सड़कों पर आ गई." उनका यह बयान स्पष्ट करता है कि अमेरिका ने सामान्य नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को अपनी भू-राजनीतिक बिसात का मोहरा बनाया है.
वाशिंगटन की इस आक्रामक और कठोर नीति ने ईरान में मानवीय संकट को गहरा कर दिया है. दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के दौरान ईरान ने दशकों का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन देखा, जो सीधे तौर पर अमेरिकी आर्थिक घेराबंदी का नतीजा था. अमेरिका ने न केवल ईरान के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणालियों तक उसकी पहुंच को भी पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया.
अर्थशास्त्री मोहम्मद रजा फरजानेगन के अनुसार, अमेरिका ने 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' का इस्तेमाल कर दुनिया भर की कंपनियों और देशों को डराया कि यदि वे ईरान के साथ व्यापार करेंगे, तो उन्हें अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर कर दिया जाएगा. इस नीति ने न केवल ईरान के विदेशी भंडार को विदेशों में फ्रीज कर दिया, बल्कि दवा और भोजन जैसी अनिवार्य वस्तुओं के आयात को भी लगभग असंभव बना दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह 'आर्थिक युद्धनीति' सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है क्योंकि यह व्यावसायिक जोखिमों का उपयोग करके आम जनता के निवाले को छीनने का काम कर रही है.
इस तथाकथित 'मैक्सिमम प्रेशर' यानी अधिकतम दबाव की रणनीति का परिणाम अत्यंत विनाशकारी रहा है. जनवरी 2026 तक ईरानी रियाल का मूल्य गिरकर 15 लाख प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जबकि महज एक साल पहले यह 7 लाख के स्तर पर था. इस ऐतिहासिक गिरावट के कारण ईरान में खाद्य मुद्रास्फीति 72 प्रतिशत से ऊपर जा पहुंची है, जिससे मध्यम वर्ग का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है.
यह केवल एक अस्थायी आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि एक पूरे देश की मानवीय पूंजी और बचत का व्यवस्थित विनाश है. ट्रेजरी सचिव बेसेंट द्वारा इस संकट को "बिना गोली चलाए किया गया युद्ध" कहना वाशिंगटन की उस क्रूर मानसिकता को दर्शाता है, जहां किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को पंगु बना देना एक उपलब्धि माना जा रहा है.
अमेरिका की इस नीति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'आर्थिक आतंकवाद' के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि यह कूटनीतिक रास्तों के बजाय निर्दोष नागरिकों को भूखा मारकर राजनीतिक लक्ष्य साधने का प्रयास है.
ब्रूस फेन जैसे कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि इस तरह के आर्थिक हथकंडे शायद ही कभी शासन परिवर्तन में सफल होते हैं, बल्कि ये केवल आम जनता की तकलीफों को बढ़ाते हैं. जब लोगों की प्राथमिकता केवल दैनिक जीवन के लिए संघर्ष करना बन जाती है, तो लोकतांत्रिक सुधारों या क्रांतियों की संभावना और कम हो जाती है.
स्कॉट बेसेंट का यह स्वीकारोक्ति भरा बयान कि अमेरिका ने जानबूझकर ईरानी बैंकिंग प्रणाली को धराशायी किया, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नैतिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करता है. यह स्पष्ट है कि वाशिंगटन का असली एजेंडा क्षेत्रीय स्थिरता नहीं, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र की आर्थिक रीढ़ तोड़कर उसे अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर करना है, चाहे इसके लिए कितनी भी बड़ी मानवीय कीमत क्यों न चुकानी पड़े.